Tuesday, March 17, 2015

कुम्भ का मेला

बरसों से सुनते आ रहे हैं कि कुम्भ के मेले में बड़ी भीड़ होती है , वहां दुनिया भर के साधु -संत आते हैं , हजारों -लाखों लोगों का हुज्जूम जमा होता है , नागा साधु अगर नाराज हो जाय तो , मार -काट मचा देते हैं , कहीं बीमारी फ़ैल जाती थी तो कहीं भगदड़ मच जाती थी , फिर भी हमारे खानदान से २० लोग कुम्भ लाभ के लिए गए , आज से ७० बरस पहले की बात है , घर के सभी पुरुष मेला देखने इलाहाबाद गए थे , मेला तो महीने भर से अधिक चलना था लेकिन कह कर गए थे आठ दिन में आ जायेंगे , माँ , चाची ताई ,सब घरों में थीं , माँ ने सोचा सब लोग कुम्भ गए हैं तो हम लोग गंगा नहाने चले जाते हैं , माँ , कुछ बच्चों को लेकर गंगा के लिए निकल पड़ीं।

उस समय कोई संचार साधन नहीं थे बस , अख़बार छपते थे वो भी दूसरे दिन खबर छप पाती थी , कोई आता -जाता होता तो खबर मिल जाती थी , कुम्भ में गए घरवालों की कोई खबर नहीं थी , माँ चिंतित तो थी पर उस समय सब भूल गईं , घर से खाना बनाकर ले गईं कि जब स्नान हो जायेगा तब , बच्चों के साथ वहीँ खाना खा लेंगे , रास्ते भर कोई भीड़ नहीं थी क्योंकि कुम्भ में जाने वाले अधिक थे , गंगा स्नान को कम लोग ही निकले थे , गंगा घाट पर लाउडस्पीकर में जोर -जोर से बोला जा रहा था , गंगा में गहराई में न जाएँ , बच्चों को साथ रखें , कूड़ा गंगा में न फैकें लेकिन साथ ही कुम्भ में मरने वाले परिवार वालों का भी बता रहे थे।

हम लोग जब स्नान कर चुके और खाना खाने के लिए साफ़ स्थान खोज रहे थे तभी माँ ने सुना कि राम चन्द्र , कानपुर वालों का पूरा परिवार ख़त्म हो गया है , माँ , घबरा गई , अब क्या करे , तभी घर वापस जाने के लिए तांगा देखने लगी , बच्चों से कहा , अब घर चलो वहीँ खाना खा लेना , बच्चे कुछ नहीं समझे , चुपचाप माँ के पीछे हो लिए , जब घर पहुंचे तो माँ ने रोना चालू कर दिया था , अभी तक कोई भी मेले से वापस नहीं आया था , सभी लोग परेशान हो गए , हालाँकि सब लोग अलग -अलग गए थे लेकिन हो सकता है वहां सब मिल गए हों , पड़ोसियों ने समझाया कि अभी दो दिन इंतजार करो जब कोई न आये तब पुलिस से पता लगाएंगे , माँ , शांत हुई और खाना भी खा लिया।

दो दिन बाद खानदान के चार लोग वापस आ गए लेकिन बाकी लोगों का कोई पता नहीं लगा , उन्होंने बताया कि बड़ी भीड़ है , हाथ को हाथ नहीं दीखता , हाथ छूटा तो बिछड़ गए , मिल नहीं सकते , हमने तो हाथ बांध रखे थे , हर दिन नई कहानियां सुना रहे थे , फिर चौथे दिन दो लोग वापस आ गए उन्होंने आकर कुछ नई बातें बताना शुरू कर दिया , बीमारी फ़ैल रही है , बहुत लोग मर रहे हैं , कोई गिनती नहीं है , अभी तक राम चन्द्र जी नहीं आये थे , माँ की घबराहट बढ़ती जा रही थी।

सारे रिश्तेदार आ गए , बाबा का कोई पता नहीं चल रहा था , चार दिन बाद तो घर में कुहराम मच गया , माँ का रो रोकर बुरा हाल था , सभी लोग एकत्र थे , अब तो कोई आस न रही पुलिस ने भी कह दिया राम चन्द्र नाम का व्यक्ति मरा है , क्या करें , पंडित जी ने बोला जब तक व्यक्ति का शरीर न हो तब तक अंतिम संस्कार कैसे कर सकते हैं , दो लोग कुम्भ भेजे गए , दुसरे दिन पता लगा कि राम चन्द्र नाम का व्यक्ति मरा है लेकिन गंगा में बहा दिया , सरकार क्या करेगी रखकर , अब तो , पक्का था कि बाबा इस दुनिया में नहीं रहे , पंडित ने शास्त्र देखना शुरू किया ,यदि कुम्भ में मृत्यु हो तो क्या , संस्कार करना चाहिए , कोई कुछ बोलता , कोई कुछ।

माँ , कुछ भी समझ नहीं पा रही थीं , तभी एकदम सन्नाटा हो गया , घर भर के लोग चुप हो गए , सुई गिरने की भी आवाज सुनी जा सकती थी , ताऊ बोले जा रे , महेश !! मिठाई लेकर आ , तभी पता चला बाबा अपने दोस्त के साथ वापस आ गए हैं , माँ , बहुत अचम्भित थी और खुश भी , सभी खुश थे , ताऊ ने बाबा से पूछा क्यों देर लगी , तब बाबा ने अपना हाल सुनाया कि एक हलवाई की दुकान पर बड़ी भीड़ थी ,वो लोगों को खिला नहीं पा रहा था तो , दौनों ने वहां काम कर लिया , जलेबी बनाने का काम किया , दो दिन तक जलेबी ही खाईं तो दस्त लग गए , वहीँ गंगा किनारे बालू में  तक पड़े रहे , जब पुलिस आई तो , स्वास्थ केंद्र भेजा गया , दो दिन वहां लग गए , जब चलने लायक हुए तो घर आये।  सभी प्रण किया अब कोई कुम्भ नहीं जायेगा।

विद्या शर्मा 

Monday, March 16, 2015

अनोखी शादी

हमारे घर पर लोगों का आना -जाना लगा ही रहता था क्योंकि बाबा वकील जो थे , उनके दोस्तों के  घर कोई उत्सव होता तो हम सब जाकर धमाचौकड़ी मचाते थे , हर महीने कभी किसी का जन्म दिन होता कभी किसी की शादी की सालगिरह होती , कभी शादी होती तो कभी बीमारी , यही सब लगा रहता था , अंजना ने बीएड किया था तो अग्रवाल कॉलेज में लेक्चरर बन गई , सुबह से शाम होती रहती थी सब अपनी दुनियां में मस्त थे , अंजना शाम को कुछ बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी , समय यूँ ही निकल जाता था।

अंजना की शादी हो गई डाक्टर साब दो बरस बाद ही एक दुर्घटना का शिकार हो गए और अंजना हम लोगों के बीच ही बनी  रही , वही पुराना रहन -सहन ही चल रहा था , लेकिन अब अंजू ने अलग घर ले लिया था , साथ में अम्मा चली गई थीं , कभी अकेली भी रहती , बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम अभी भी कर रही थी उनमें एक बच्चा राहुल अंजू से इतना पभावित हुआ कि उसका सारा काम चाहे बिल जमा करना हो , सब्जी लाना हो , दूध लाना हो सब करने लगा , बस मौसी आप बोलो मैं करूँगा सारे काम , उसके माता -पिता भी बुरा नहीं मानते थे क्योंकि बाबा के दोस्त थे , वे भी वकील थे।

जब भी कोई बात राहुल को करनी होती दौड़कर आता और चाय बनाकर देता , बोलता मौसी , मुझे बताया करो , अपनी सारी मुश्किलें अंजू से कहता रहता , जब थोड़ा सयाना हुआ तो अंजू के पास गया और बोला - मौसी मैं , शादी करूँगा तो बिना दहेज़ वाली , लड़की को एक जोड़े में ही घर लाना चाहता हूँ , राहुल शहर में बुक स्टोर चलाता है , घर खर्च का निकाल लेता है , अंजू तो खुश थी चलो , कुछ तो शिक्षा काम आई , एक शिष्य ने तो काम किया , लेकिन राहुल के पिता चमन लाल जी को समझाना आसान न था ,पर राहुल ने उन्हें भी अपने हक़ में कर लिया।

एक दिन राहुल आया और शादी का कार्ड देकर चला गया , तब समझ आया अब कुछ नया घटने वाला है , सारे   रिश्तेदार नाराज थे , बरात में जाने को नहीं मिल रहा था , राहुल पंडित जी को लेकर गया , एक जोड़ा लड़की के लिए और नई साईकिल पर अपनी पत्नी शीला को बिठाकर ले आया , दुसरे दिन घर में दावत रखी थी , चार दिन बाद राहुल अंजू के घर आकर चाय बना रहा था , अंजू कह रही थी बेटा !! अब तेरी शादी हो गई है , बहु बुरा मानेगी , नहीं मैं , उसे समझा लूंगा , मौसी !! जो कहा था वो किया , अब देखो , लड़के क्या समाज में नई लहर लातें हैं , पूरे शहर में अखबार राहुल की खबर से भरे थे , कुछ दिनों बाद सब भूल गए किसी ने सबक नहीं लिया। दहेज़ के लालची चुपचाप विवाह कर रहे थे। अंजू तो खुश थी चलो , किसी ने तो उसकी शिक्षा को ग्रहण किया।

विद्या शर्मा 

काकी

बरसों पुरानी बात है , माँ ,ताई , काकी , काका , ताऊ , बाबा और सारे भाई बहन सब एक साथ ही रहते थे , कोई भी समझ नहीं आता था कि कौन सगा भाई बहन है कौन चचेरा , माँ तो पूरे दिन घर के काम में लगी रहतीं थीं उसके बाद जो समय मिलता था , तब भी कुछ न कुछ करती ही रहतीं थी , कभी सिलाई -कढ़ाई , कभी बुनाई कभी , अचार डालने का काम करने लगतीं , काकी की कोई संतान नहीं थी फिर भी सुबह से शाम तक वे व्यस्त रहतीं थीं , काकी ऊपर रहतीं थी , आँगन में काकी के कमरे की खिड़की खुलती थी जो हमेशा खुली ही रहती थी , सामने ही माँ की रसोई थी तो हर समय कौन क्या कर रहा है , सब दिखाई देता रहता था।

माँ , अपना काम ख़त्म ही नहीं कर पाती थीं , काकी घूमने के लिए तैयार हो जातीं थीं , काकी के साथ घर के बच्चे घूमने में मस्त रहते थे , कभी राम लीला देखने , कभी गंगा नदी में डुबकी लगानी हो हर बात के लिए काकी तैयार रहतीं थीं , जब बाबा को पता चलता कि घर के लोग शहर में घूम रहे हैं तो घर आकर डांट लगाते थे , तब काकी ही सबको बचाती थीं , काकी का नाम सुनते ही बाबा चुप हो जाते , काकी जब खाना बनातीं तो माँ और ताई के साथ ही खाना खातीं थीं चाहे कितना भी इंतजार करना पड़े , जो भी बनातीं सभी को चखने देतीं।

माँ , जब स्वेटर बुनना शुरू करती तो काकी भी एक स्वेटर डाल लेतीं , रात भर लालटेन की रौशनी में काकी स्वेटर बनाती रहतीं सुबह जब माँ , देखतीं तो पूरा स्वेटर उधेड़ देतीं क्योंकि वो ज्यादा बड़ा हो जाता था , काकी अपनी धुन में काम करती रहतीं , लेकिन सर्दी ख़त्म होते -होते स्वेटर बन जाता , काकी कभी हार नहीं मानती थीं , माँ जब बड़ा चादर काढ़ने का मन बनाती तब काकी भी बाजार से चादर ले आती और बनाने के लिए छपाई करवा लेतीं , माँ , समझा देती यहाँ ये रंग लगाना , यहाँ पर ये वाला लेकिन काकी का चादर जब तैयार होता तब रंगों का कोई महत्त्व न होता , कभी फूल हरा होता कभी पत्तियां लाल होतीं जो रंग का धागा सुई में होता , चादर उसी रंग से बनती जाती , सब लोग हँसते लेकिन काकी कभी बिचलित नहीं होती , उन्हें तो सब कुछ जानने से मतलब था।


काकी , निरी सहज , सरल , सच्ची , भोली और जिंदगी को उसी के बहाव के साथ जीने में भरोसा रखती थी ,संतान न होने का दुःख उन्हें कभी नहीं रहा , उम्र के अंतिम पड़ाव पर काकी अपने भाई -भतीजों के पास चली गई , आज भी काकी की कर्मठता याद आती है , वे अब दुनियां छोड़ गई लेकिन यादें यहीं भटकती हैं।

विद्या शर्मा 

बिरजू का भूत

माँ , अपने पीहर बहुत कम जाया करती थीं , नाना नानी बहुत पहले ही गुजर गए थे , मामा था जो अपने दोस्तों के साथ घूमता रहता था , कभी खेत पर जाता ,कभी शहर में घूमता ,बस यूँ ही अपना समय बर्वाद करता था जब ,माँ ,बाबा की डांट -फटकार से दुखी हो जातीँ तो मामा के पास जाने का विचार पक्का कर लेती , हम छोटे बच्चे साथ हो लेते थे , माँ , एक बूढी नानी ननकी के घर जाती थी गेंहू पीसने के लिए , निठल्ला मामा घर की हालत ख़राब करके रखता था , माँ , एक हफ्ते तक घर ही संभारती रहती , कुछ दिनों तक मामा की आवारगी पर रोक लग जाती थी।

वहीँ गांव के कुंए के पास हरिया और बिरजू का घर भी था , दौनों साथ -साथ खेत पर जाते , जानवरों का काम करते , आराम करते फिर अलाव जलाकर ,दोस्तों के साथ किस्से -कहानियां सुनाते रहते ,मामा उन लोगों के पास जाकर ताश खेलता था , माँ , डांट लगाती थी ,पर उसपर कोई असर नहीं होता था , हरिया अपने घर के बरांडे में सोता था , बिरजू सुबह चार बजे आवाज लगाता और हरिया उठकर मुंह -हाथ धोता और बिरजू के साथ चल देता , यही रोज का नियम था , दिन में पेड़ की छाँव में आराम करते थे , जब ये लोग खेत पर होते तो हरिया की माँ , खेत पर ही रोटी और अचार ले आती थी दोनो दोस्त खाना खाते और खेत का काम पूरा करके ही वापस आते।

माँ , पंद्रह दिन से अधिक कभी नानी के घर नहीं रूकती थी , मामा यह जानता था , एक रात को सब लोग अलाव पर कहानिया सुना रहे थे , तभी बिरजू को दस बरस पुरानी बात याद आ गई , बहन जी सच्चा किस्सा सुनाता हूँ , मैं रोज हरिया को लेने जाता था , एक दिन मुझे बुखार आ गया तो में न जा सका लेकिन हरिया के पास सुबह तड़के बिरजू के रूप में भूत पहुँच गया , हरिया भी उठा और साथ चल दिया , रास्ते में लगा आज तो रात अधिक है , बिरजू !! आज जल्दी क्यों आया ? नहीं ऐसा नहीं है , तू चल , लेकिन हरिया थोड़ा डर गया तो वहीँ बैठ गया और चिलम जलाने लगा , बिरजू का भूत बोला ! भाई चल आग मत जला , हरिया समझ गया कुछ तो गड़बड़ है सब जगह सन्नाटा था , खेत तक गया तभी हरिया ने सोच लिया चिलम नहीं छोड़ेगा लेकिन बिरजू भूत ने खेत का काम करवाने के लिए बैल लगवा लिए और हरिया का पैर बैल की डोरी में फंस गया , बैल बिदक गए क्योंकि जानवर तो भूत की उपस्तिथि समझ रहे थे।

हम लोग माँ के आँचल में घुसते जा रहे थे , मामा भी डर रहा था , तब बिरजू ने बताया कि बैल हरिया को घसीटते हुए घर तक ले आये , रास्ते में ही हरिया के प्राण पखेरू उड़ गए , गांव भर में दहशत  फ़ैल गई वो तो अच्छा हुआ मैं बीमार था वरना लोग मेरा भी जनाजा निकाल देते , मुझे बहुत दुःख हुआ मेरा दोस्त इस तरह गया , कई बरस तक मैं खेत पर काम नहीं कर पाया , अब सब ठीक है , लेकिन मेरा रूप धरकर मेरे दोस्त को मार डाला। हम सभी आश्चर्य चकित थे।  मामा के गांव में फिर कभी जाना नहीं हुआ। आज भी पुराने किस्से याद आते हैं।

विद्या शर्मा  

Friday, March 13, 2015

मामी की सहेली

राजस्थान में छोटा सा गांव डावली , वहां मामा दो और एक मामी रहते थे , कच्चा घर था , दो बड़े -बड़े बरांडे , एक आँगन बड़ा सा , दो कमरे।  बरांडे में अरहर की लकड़ी लगाकर जानवरों के लिए बाड़ा बनाया गया था , जहाँ मामी की सहेली भैंस लीला रहती थी , बड़े मामा का विवाह नहीं हुआ था , छोटे मामा का हुआ भी तो मुश्किल से एक बेटी पैदा हुई जो शादी के बाद अपने घर चली गई , मामी अकेली रह गई क्या करती , जब देखो ,तब भैंस का ही काम करना पड़ता था , मामी को लीला के अलावा कोई नहीं भाया उसी को सहेली बना लिया , पूरे गांव को पता था कि मामी अपनी सहेली से सारा सुख -दुःख कहती है , कभी जब मामा से नाराज हो जातीं तो सीधे लीला के पास जाकर दुखड़ा रोया  जाता।

मामा के पास एक बड़ा बाग़ था जिसमें सभी फलों के पेड थे , उसी में फसल भी हो जाती थी जब भी मामा घर आते कुछ अवश्य लाते थे लेकिन इतने कंजूस थे कि कभी भी आम , अमरुद नहीं लाते थे , जब बाग़ खाली होने लगता तब लेकर आते वो भी १५ से २० अमरुद , मामी बड़ी खुश मिज़ाज थी , जब भी माँ के घर से हम जाते तब , मामी घी से पूरी बनाती , घी का हलवा बनाती , खीर बनाती और बड़े प्यार से खिलाती , माँ डावली कम ही जा पाती थी , सायकिल से हम जाते और शाम को वापस आ जाते , मामी जाते समय दस रूपये हमारे हाथ में पकड़ा देती।

मामी अपनी सहेली लीला को जब कभी मामा की बेरुखी बताती तो लीला भी कभी मुंह हिलाकर , कभी आँखें मटकाकर जवाब देती थी , घंटों तक मामी लीला से बातें किया करती और लीला एक टक मामी को निहारती रहती , कभी जब मामी बीमार होती तब , मामी को चाटकर लीला प्यार बरसाती। मामा तो बाग़ का काम देखने के बाद घर के बड़े बरांडे में रामायण , कभी महाभारत का पाठ शुरू कर देते , गांव के लोग भी सुनते और रात में वहीँ सो भी जाते , सुबह उठ कर जाते , एक बार मामा के घर गए तो बारिश हो गई और रात वहीँ रहने का निश्चय किया , सुबह देखा सायकिल के पास स्वाफी रखीं थी , मामा रात को तो नहीं थीं तभी भुस के ढेर से चार पांच लोग निकले और स्वाफी से मुंह साफ़ करते हुए चले गए , तब मामा ने बताया कि गांव के लोग हर वस्तु का उपयोग करना जानते हैं , उन्हें पता है कि भुस गरम रहता है।

मामा ने साथ में टोसा बाँधा और हम घर आ गए ,मामी अपनी सहेली के साथ फिर व्यस्त हो गई। गांव की जिंदगी बहुत ही सहज होती है।

विद्या शर्मा 

बाबू जी

शारदा का विवाह ६० के दशक में एक जमीदार परिवार में हुआ था , शहर में रहने वाली लड़की को गांव में आकर थोड़ा सामंजस्य बिठाना पड़ा , सास ससुर , ननदें , देवर  सभी के साथ रहना जरा सा कठिन रहा , लेकिन जब , घर में लड़की आ जाती है तब , सब आसान हो जाता है , घर के चौबारे में , बड़े नीम के पेड़ पर सावन में झूला पड़ जाता था , रात में घर की औरतें एक जगह आ जातीं और सावन के मल्ल्हार गाने लगतीं , दिन भर की थकान पल भर में छूमंतर हो जाती थी , पता ही नहीं चलता था कितनी रात हो गई है

शारदा के ससुरजी इलाहबाद से वकालत करके आये थे , अंग्रजों की खिलाफत करते थे लेकिन  अंग्रेजी ही पढ़ाते थे , कई वकील उनसे वकालत की शिक्षा लेने आते थे , बाबूजी ने होम्योपैथी का प्रशिक्षण लिया था , वे डॉ, थे , गांव के किसी भी बीमार आदमी को दवा देते थे , सभी को उनकी दवा से फायदा भी होता था , बीमार एक कटोरी में साफ़ पानी लाता था और वे उसमें दवा की कुछ बूँदें डाल देते थे , दूर -दूर से लोग उनके पास इलाज के लिए आते थे।

एक आदमी उनके पास आया जिसकी नाक लम्बी हो गई थी , बाबूजी ने देखा और एक खुराक खिला दी और दूसरी बाद में खाने को कहा और बीमार ठीक हो गया , बाबूजी की शौहरत सब जगह फ़ैल गई , वकालत से ज्यादा डाक्टरी चल रही थी पर वे किसी से एक पैसा नहीं लेते थे , एक मरीज़ इतना मोटा हो गया था उसे ठेल पर लिटा कर लाया गया , उसे दवा खिला दी , दूसरी एक हफ्ते बाद और कहा इसे ऐसी जगह रखना जहाँ से यूरिन पास कर सके , जल्दी -जल्दी। मरीज़ जल्दी ठीक हो गया।

बाबूजी सुबह से घर से निकल जाते थे कभी कोर्ट जाते कभी कचहरी क्योंकि जमीनों के मुकदद्मे लगे हुए थे , उनकी खाली पड़ी जगहों पर लोगों ने अपने घर बना लिए थे , कोई खेती करने लगा , हर समय इन्ही कामों में व्यस्त रहते थे ,हमेशा पैदल ही जाते थे ,कभी एक रास्ते से नहीं आते जाते थे क्योंकि लोग उनकी जान के पीछे पड़ गए थे , घर -परिवार वालों  जल्दी घर आने को बोलते थे , शारदा के पति अक्सर देर से आते तो बाबूजी खूब फटकार लगाते लेकिन किसी पर कोई असर नहीं होता था।

बाबूजी सुबह दूध दलिया खाते और कोर्ट चले जाते , दिन में चने मुरमुरे और मूंगफली खाते फिर शाम को ही खाना खाते , गांव भर के मसले बाबूजी ही सुलझा देते थे , कभी गांव में पुलिस नहीं आई और न कभी कोई झगड़ा ही होता था , गरीब लोगों को हर महीने गेंहू , चना , बाजरा जो भी संभव सभी को देते थे , शादी ब्याह की मुश्किलें भी बाबूजी ही देख लेते थे , किसी को होली पर रंगना हो तो अंदर आकर बता देते थे और रंगने के बाद बोल देते अरे !! मैंने तो मना किया था ,शादी की हर रस्म का आनंद लेते थे , बेटे की शादी में घरातियों से कहकर ज्योनार गाने को कहा , जिसमें बरातियों को गालियां दी जातीं हैं।

बाबूजी दुनियां में निराले ही थे , सीधे , सच्चे , हंस मुख , ईमानदार , सरल और महान इंसान थे , उनके जैसा अब , कोई भी होना मुश्किल है।

विद्या शर्मा  

Tuesday, March 10, 2015

दुहरा कर्ज

वैदेही के खानदान में तीन पीढ़ियों से कोई कन्या संतान नहीं थी , दादी ने चार बेटों को जन्म दिया , गजोधर , रामदेव , राम दयाल  और नौबत राम। सभी खुश थे , गृहस्थी का खर्च तो चल जाता था लेकिन युवा होते बेटों को आधुनिक सुविधाओं ने अपनी ओर खींचना शुरू कर दिया था तो वे गांव से पलायन करने लगे और एक दिन शहर  में  अपना आशियाना बना लिया।

बड़े बेटे के घर  दो बेटियों ने जन्म लिया , दूसरे को एक बेटा , तीसरे को कोई संतान नहीं हुई चौथे बेटे के घर पांच बेटी और पांच बेटों ने जन्म लिया , दादी का आशीर्वाद वैदेही की माँ को ही लगा , दादी हमेशा कहती थी पांच कन्या हों , सभी बहुत खुश थे , पहली कन्या तो नाजों से पल रही थी , ताऊ ने चौदह बरस की उम्र में भानु प्रिया का विवाह कर दिया , पति हाथरस के जमीदार परिवार से थे , गांव में रईस बनकर रहना अलग बात होती है , उनकी दामाद वाली ठसक थी , घर के मुखिया थे तो अलग रुतवा था , अन्य बेटियां अभी पढ़ रहीं थीं।

वैदेही का परिवार मिलकर रहता था , कोई समझ ही नहीं पाता था कि कौन चाचा का बच्चा है कौन ताऊ का , भानुप्रिया जब छोटी थी तब ताऊ से बोल दिया करती थी देखना बाबा आपके ऊपर मेरा दुहरा कर्ज है वे समझ नहीं पाते थे , कहते हाँ बेटी , ठीक है तुझे जो चाहिए बता सब मिल जायेगा , सब हंसी में बातें होती रहती थीं , भानु ससुराल से जल्दी ही घर आने की जिद करती थी , घर आती तो ससुराल जाने की जिद करती उनका मिजाज कुछ बदल रहा था , पति अपनी शिकायत सासु जी से करते तो भी सभी लोग मज़ाक में ले जाते , धीरे -धीरे दौनों के रिश्ते में खींचा तानी शुरू हो गई और एक दिन भानुप्रिया पीहर आने की जिद करने लगीं तब पति तेज बहादुर ने कह दिया अब , वापस न आना और भानुप्रिया ने रेलगाड़ी में ही नींद की गोलियां खा लीं और हमेशा के लिए पीहर और ससुराल का सिलसिला ख़त्म कर दिया।

ताऊ के साथ ही सारा घर बिटिया के जाने से दुखी था , ताई भी दुनिया छोड़ गई , एक बरस तक सब सामान्य हो गया , तब एक रात चाची को सपना आया कि आप लोग दुखी न हों , मैं वापस आ रही हूँ , वैदेही की माँ चौथी संतान को जन्म देने वाली थी , धीरे -धीरे घर के सभी सदस्यों को स्वपन आया और यही बात निश्चित हो गई कि भानुप्रिया आ रही है , सभी बेसब्री से इंतजार करने लगे , ताऊ की ख़ुशी का तो ठिकाना ही नहीं था , वो समय भी आया जब , भानु वापस चाची की संतान के रूप में घर आ चुकी थी , भानु के शारीरिक चिन्ह तक सोना के शरीर पर मौजूद थे , जब , कभी तेज बहादुर ससुराल आते तो सोना छुप जाती थी क्योंकि उस समय लड़कियां पति से भी पर्दा करतीं थीं , माँ को चार साल की सोना बता देती थी कि उन्हें क्या पसंद है क्या नहीं , तेज के सामने नहीं जाती थीं , सोना की बहुत सारी बातें ताऊ को पक्का करतीं थीं कि अवश्य ही भानु अपना दूसरा कर्ज लेने के लिए आई है।

ताऊ की लाड़ली सोना अभी ग्रेजुएशन ही कर रही थी कि हाथरस से ही इंजिनियर का  रिश्ता आया और सोना का विवाह भी तय हो गया , सोना जब ससुराल गई तब पता चला कि पहली वाली ससुराल से भी आना -जाना है , सोना एक बरस ही अपने पति के साथ रह पाई इस बार पति मुकेश ने आत्महत्या करली , कारण पत्नी पीहर नहीं जाएगी चाहे पहली रक्षा बंधन ही क्यों न हो , हिसाब बराबर हो गया , पहले भानुप्रिया ने साथ छोड़ा इस बार मुकेश ने साथ छोड़ा , सोना अकेली रह गई।

ताऊ सोचते थे कि जाने कैसा कर्ज था , कुछ समझ नहीं आता , बड़ी ख़ुशी के साथ ताऊ ने कर्ज अदा किया , इस वाकये से एक बात तो समझ आती है कि हम सभी को अपने कर्मों  का हिसाब रखना चाहिए , इस नहीं तो उस जन्म में अवश्य चुकाना होगा , ताऊ जब बीमार पड़े तब , उनकी छोटी बेटी माया बिलकुल ध्यान नहीं देतीं थीं , उन्हें शक था बाबा अवश्य ही सोना को वसीयत का हिस्सा देंगे , हुआ भी यही बाबा जब घर ठीक होकर आये तब , सोना को भी अपनी संपत्ति का हक़दार बना दिया। धन के लिए कटुता आना स्वभाविक था लेकिन समय ढलते हुए सब ठीक हो गया , ताऊ भी एक दिन नहीं रहे , कर्ज का मतलब वैदेही समझ चुकी थी।

विद्या शर्मा 

Monday, March 9, 2015

रजिया का भय

माया सरकारी स्कूल मैं टीचर है , हर समय बच्चों के साथ व्यस्त रहती है , स्कूल के बाद का समय भी बच्चों को पढ़ाने में निकाल देती है , करे भी क्या ? शादी के ग्यारह महीने बाद ही उसके पति नहीं रहे , एक बेटा है जो वहीँ के अंग्रजी स्कूल में पढता है , अभी तो बेटा रजत भी सातवीं में है , यही सोचकर स्कूल के पास ही घर भी ले लिया , माया अकेली ही रहती है , ससुराल वालों ने साथ नहीं दिया , पीहर दूर है उन्नाव में तो रोज कोई आ नहीं सकता , क्या करे ? अभी तो समय भी नहीं है , माया ने अपनी दुनिया को अपने में ही डुबो रखा है।

माया के घर के पास रजिया रहने को आई है , पति बैंक में काम करते हैं एक बच्चा है जो दो बरस का है , रजिया कुछ दरी हुई सी रहती है जाने क्यों उसे कुछ संकोच सा होता है जब माया के पास बात करने आती है , अभी उनकी कॉलोनी में अधिक लोग रहने नहीं आये , दो ही परिवार हैं तो बात करना भी जरुरी है , रजिया चाहती ही अपने बेटे हारून को पढने के लिए भेज दिया करे लेकिन पूरा साल लगा दिया निर्णय करने में , रजिया शाम होते ही आती है और हारून को माया के पास छोड़कर चली जाती है , अब वो ,माया को थोड़ा सा समझने लगी है।

रजिया घर आती है , अब चाय भी पी लेती है , रजत से भी बात करती है और माया के दिल में भी झांकने का प्रयास करती है , उसकी व्यथा को भी पढ़ने का मौका खोजती है , अभी सिलसिला रफ़्तार पकड़ ही रहा था कि शहर में हिन्दू मुस्लिम झगडे हो गए हालाँकि उन झगड़ों से न माया का कोई लेना देना था और न रजिया का , लेकिन रजिया ने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया था अब न बच्चे को पढ़ने आने देती न , पति को बात करने देती और न खुद ही माया से बात करती , जाने क्यों रजिया डर गई , हिन्दू हैं तो मार डालेंगे या उसका बुरा ही कर देंगे।

थोड़े समय बाद उसके पति हश्फ़ाक़ का तबादला आगरा हो गया , अब रजिया अकेली रह गई , बच्चा जिसने स्कूल बंद  कर दिया था , माया ने दोबारा उसे स्कूल भेजा और रजिया को समझातीथी कि तुम सुरक्षित हो डरो मत , हम हैं ,कुछ समय बाद दोनो परिवार  वैसे ही हो गए , चाय से लेकर खाना तक एक साथ होने लगा तब कई बार रजिया ने माया से माफ़ी मांगी , अब कोई भय नहीं था रजिया और माया के बीच।

जब , रजत की शादी हुई  तब रजिया अपने परिवार के साथ अलीगढ़ रहने चली गई थी लेकिन विवाह में आकर खूब धमाल किया , अब ,  परिवार का फर्क नहीं किया जा सकता।  सारे त्यौहार एक साथ मनाये जाते हैं , रजिया का  भय जाते -जाते कई बरस लग गए।

विद्या शर्मा

Wednesday, March 4, 2015

वसीयत

सुकन्या अपने माता -पिता के साथ बालूगंज में रहती थी , पिताजी का कारोबार वहीँ चल रहा था , मेडिकल की दुकान ५० साल पुरानी थी , हर कोई पिताजी को डाक्टर साब ही बोलता था क्योंकि छोटी - मोटी दवा तो वे ही दे देते थे , सब कुछ ठीक चल रहा था , पिताजी के पास गांव से खत आया माँ यानि दादी की तबियत ख़राब रहती है , तो पिताजी को उन्हें लेकर आना है , दो दिन भाई को दुकान सौंपकर पिताजी गांव चले गए , दादी अब हमारे पास आ गई।

भाई मेडिकल की पढाई कर रहा था और मैं बी ,ए कर रही थी , माँ घर का काम करती और दादी का ख्याल भी रखती , छोटा सा परिवार बहुत ही अच्छा चल रहा था , गांव से कभी  ताऊ आ जाते तब जरूर घर  की शांति भंग होती थी क्योंकि खेत का हिसाब इतना नहीं इतना था , वो जमीन तो उसने हड़प ली ,अब हमारे पास नहीं है यही किस्से चलते रहते , कुल मिलाकर चाचा लोग हमें गांव से दखल ही करना चाहते थे , वे लोग चाहते थे कि हम यहाँ बहुत कमाई कर रहे हैं तो गांव का सब छोड़ दें , पिताजी मान भी गए , वे चाहते थे सब लोगों में एकता रहे।

अचानक एक दिन दादी की तबियत ख़राब हो गई , अस्पताल ले गए , वहां दस दिन रहीं और हमेशा के लिए चली गईं , गांव भर के लोग आये , १५ दिन तक यहीं डेरा जमाकर रखा , वो तो हमारे पडोसी बहुत अच्छे थे जो पिताजी को अकेले पन का अहसास नहीं होने दिया और दादी की अंत्येष्टि ठीक से संपन्न हो गई , इस बात पर भी गांव वाले नाराज ही होकर गए कि सब कुछ ठीक कैसे हुआ।

सबके जाने के बाद माँ की तबियत ख़राब हो गई क्योंकि बहुत काम किया था , भाई पढ़ने चला गया मैं , माँ के साथ घर का काम देखने लगी तो सोचा अब प्राइवेट फार्म भर दुंगी पढाई होती रहेगी , माँ किसी तरह मान गई , पिताजी अब पहले सी कमाई नहीं कर पा रहे थे क्योंकि अब कई दुकानें खुल गई थीं और फिर माँ की तबियत के कारन चिंतित भी रहते थे , पडोसी श्याम बिहारी जी पिताजी को बड़ा भाई मानते थे , अपने सारे काम पिताजी से पूंछकर ही करते थे , अब माँ के कारन मेरे लिए रिश्ते देखने लगे क्योंकि माँ चाहती थीं उनके सामने मेरी शादी हो , पर विधि को कुछ और ही मंजूर था , माँ बीमार हो गईं और अस्पताल गईं तो वापस ही नहीं आईं , दादी की तरह वे भी चली गईं।

गांव के लोग आये और चार दिन बाद चले गए क्योंकि घर का काम उन्हें ही करना पड़ रहा था , मेरी पढाई भी छूट गई थी पिताजी भी अब शांत रहने लगे थे , मेरे साथ काम करते थे बोलते बेटी तो एक दिन चली जाएगी कितना काम करती है , श्याम बिहारी चाचा आते तो , मेरे लिए रिश्ते की ही बात होती और एक साल बाद विपिन से मेरा विवाह भी हो गया मैं , अब पास ही राजामंडी में रहने लगी , जब पिताजी को जरूरत होती आ जाती , भाई ,अब ट्रेनिंग कर रहा था , पिताजी का ध्यान श्याम चाचा चाची रखते , पिताजी को हार्ट की बीमारी हो गई थी , इलाज चल रहा था , दुकान  को अब एक लड़का बिट्टू देख रहा था , कभी श्याम चाचा भी चले जाते थे क्योंकि वे रिटायर हो गए थे।

भाई का जॉब लगा तो दिल्ली के अस्पताल में ज्वाइन किया , कह रहा था जल्दी ही पिताजी को ले जाऊंगा लेकिन एक रात पिताजी को अटैक आया तो अस्पताल भी न ले जा पाये , गांव वाले फिर हाजिर हो गए , इस बार कोई जाने का नाम नहीं ले रहा था , श्याम चाचा ने सब संभाल रखा था , भाई भी अब बड़ा हो गया था तो सारी रणनीति समझता था , श्याम चाचा ने बताया कि भाई साब वसीयत कर गए हैं तो सब लोग रुक गए , जब तरहवीं हो गई तब , वकील को बुलाया गया और उन्होंने बताया कि घर बेटी को दिया है , दुकान और गांव का खेत बेटे को दिया है तो सके पैरों से जमीन खिसक गई क्योंकि वे लोग समझ रहे थे कि उल्टा हमें कुछ मिल जायेगा , सब लोग सामान बटोर कर रवाना हो गये , भाई और हम लोग पिताजी के लिए हफ्ते भर तक शोक मनाते  रहे और वापस अपने काम पर चले गए।

विद्या शर्मा 

Tuesday, March 3, 2015

माँ

१९३० के करीब माँ आठ साल की थीं , उस समय लड़कियों की पढाई अधिक नहीं थी , चार क्लास भी आज की दसवीं के बराबर थी , माँ , बड़ी चतुर थीं , कुछ भी देखकर वैसा ही बना लेती थीं , सिलाई , कढ़ाई , बुनाई कोई भी काम ऐसा नहीं था जो माँ न कर सके , बाबा , माँ के गुणगान उनके सामने कभी नहीं करते थे , बाबा ने अपनी बेटियों को भी अच्छा पढ़ाया , लिखाया , जो भी सीखना चाहा सब सीखने दिया , लेकिन माँ का तो जबाव ही नहीं था।

माँ , सारे घर का काम करती , उन दिनों घरेलू काम के लिए सेवक मिलना कोई मुश्किल नहीं था लेकिन माँ चाहती थीं कि बेटियां भी काम करना सीखें , जब रसोई का काम निबट जाता तब , माँ सिलाई , कढ़ाई का काम करती थीं , कभी आराम नहीं किया , कुछ न कुछ सीखना ही उनकी आदत थी , माँ ने बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठा रखी थी बाबा को कह  दिया था किसी भी बेटी की शादी सत्रह साल से कम में नहीं होगी , बाबा भी सहमत हो गए थे।

माँ जाने कैसे दस बच्चों को पालतीं थीं , घर का काम करना , स्कूल भेजना , नास्ता बनाना , खाना बनाना , कपडे धोना , सफाई करना और न जाने कितने काम , कोई घर आ जाये तो खाना खिलाना , दुकान पर दस लागों का खाना भेजना , अगर मैं होती माँ की जगह तो मर गई होती , माँ पता नहीं किस मिटटी की बनीं थीं , बाबा की नाराजगी भी झेलती रहतीं थीं , लड़कियों को हमेशा अच्छी सीख देतीं थीं , किसी का अपमान मत करो , आँखें झुका कर चलो , जोर से मत हंसो , गुस्सा को पीना सीखो अमृत होता है , गीता जैसे सारे उपदेश बेटियों को घुट्टी की तरह पिलाया करतीं थीं

उस समय बेटियां तो पूरे घर , खानदान  और गांव शहर की बेटियां होती थीं , कभी कोई परेशानी नहीं होती थी , माँ फिर भी कहती थी कि लड़कियां कांच की गुड़िया होती हैं , बड़ी संभल कर रखी जाती हैं , माँ , आज ९० बरस से ज्यादा की हो गई , बाबा तो अब नहीं रहे लेकिन आज भी वे सब काम कर लेती हैं , माँ जैसा कोई नहीं।
अपनी बेटियों को क्या सीख दूँ , कुछ समझ नहीं आता क्योंकि बेटियां मुझे ही बता देतीं हैं माँ , ऐसा मत करो , क्या सही है , क्या गलत है , माँ , दैवीय शक्ति है।

विद्या शर्मा 

tabadala

तबादला हमारा परिवार बहुत बड़ा था , पिताजी चार भाई थे , उनके भी चचेरे भाई बहन थे , इस तरह करीब ७० लोगों का कुटुंब था , पिताजी गांव का घर छोड़कर सहर आ गए थे , जब थोड़ा पैसा बना लिया तब , बच्चों को अपने पास बुला लिया और निश्चय किया कि बच्चों की शादियां जल्दी करेंगे खासकर लड़कियों की , हमारे पिताजी के खानदान में दो पीढ़ियों से कोई कन्या पैदा नहीं हुई थी तो देवी जब हुई तो घर भर में ख़ुशी मनाई गई , फिर तो कई देवियों की बाढ़ आ गई , कमला , शारदा , सत्या , कात्यायनी , माया , और शैलजा आ गईं, लेकिन पिताजी कहते थे कि लड़कियों के आने से मेरा कारोबार बढ़ता ही जा रहा है . देवी ने दसवीं पास कर ली थी तभी उसके रिश्ते आने लगे , गांव के जमीदार परिवार से एक बेटा लिपिक था , उसके साथ देवी का ब्याह हो गया , देवी खुश थी लेकिन वहां जाकर पता चला कि दकियानूसी लोगों के बीच जाकर फंस गई है , औरतों के सामने भी पर्दा करना पड़ता था , सारे दिन काम करो , किसी से न बोलना न घूमना , सब कुछ पीहर में छूट गया , देवी फिर भी सब कुछ अच्छी तरह कर रही थी , पति , सुबह जाते तो रात को ही वापस आते , न घर वालों से कोई वास्ता और न पत्नी से , बस बच्चे पैदा करो खाओ और मस्त रहो , पूरा जमीदारी का ठस्का रहता था लेकिन अब ,तो जमीदारी भी नहीं रही थी . खानदान की लड़कियों तक से बात करने की मनाही थी , इसीतरह चार बच्चे भी हो गए , देवी सोचती थी संजय का तबादला क्यों नहीं होता , तब पता चला कि अपने साहब से कहकर तबादला रुकवा लेते हैं , देवी रोज ईश्वर से प्रार्थना करती थी कि पति का कहीं तबादला हो जाय तो अपने तरीके से थोड़ा जी सके , एक दिन नाराज होकर देवी ने कह दिया कि तुम्हारे बॉस से मिलूंगी , कह दूंगी मुझे तबादला चाहिए तब पति महाशय थोड़ा घबरा गए और घर के पास ही मेरठ में तबादला करवा लिया , एक हफ्ते बाद आये और सामान लेकर वापस चले गए , देवी की कामना तो जहाँ थी वहीं रह गई लेकिन मन मसोस कर रह गई . करीब १५ दिन बाद पति देव ,घर आये तो पता चला उनकी तबियत ख़राब हो गई है , एक हफ्ते आराम करने के बाद देवी को लेकर जाने का मन बना लिया , देवी दो बच्चों के साथ जाने को तैयार हो गई , दो बच्चे बुआ के पास छोड़ दिए ,सोचा था बच्चों को बाद में बुला लेगी , मेरठ जाकर थोड़े दिन अच्छा लगा क्योंकि नई जगह सामान जुटाने मे समय निकल गया , फिर वहीं घर का काम और बच्चे , देवी ने सोचा था ईश्वर ने उसकी कामना पूर्ण की है तो सत्य नारायण की कथा पढ़ लेगी , अच्छे दिन का इंतजार कर ही रही थी तो पता चला कि कल ही पूर्णिमा है तो किताब लेकर कथा की तयारी कर ली , शाम को देवी खुश थी अब पति को प्रसाद देगी और बता देगी कि कथा पढ़ी थी लेकिन पति संजय ने आते से ही बता दिया कि उसका तबादला वापस घर हो गया है , वो बहुत खुश था ,देवी कभी प्रसाद को देख रही थी कभी संजय को , क्या करे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था , आँखों में आंसू भर आये थे , भगवन की लीला समझ कर सामान पैक करने का सोचने लगी . विद्या शर्मा

Monday, March 2, 2015

तीर्थ - यात्रा

सन १९३८ की घटना याद आती है जब बाबा दादी ने निश्चय किया कि वे तीर्थ करने जायेंगे , सभी घरवाले खुश तो थे पर दुखी भी थे क्योंकि उस ज़माने में तीर्थ करना कोई आसान बात नहीं थी , आने -जाने के साधन नहीं थे , रास्ते कष्टदाई थे , रास्ते में लूटमार भी हो जाती थी , कभी जब जंगल में कोई फंस जाता था तो , जीवन पर संकट आ जाता था , सबसे बड़ी बात थी कि उस समय किसी भी वस्तु को खरीदने के लिए पैसा नहीं होता था , अनाज से ही खरीदा और बेचा जाता था।

गांव के मुखिया को छोड़कर किसी और के पास पैसा होगा सोचना भी मुश्किल था , बाबा दादी ने जीवन भर की कमाई सात रुपये हमें दिखा दिए , फैसला कर लिया कि अब जाना ही है , घर के लोग दुखी थे क्योंकि तीर्थ पर जाने के बाद किसी का घर वापस आना मुश्किल था , रास्ते में किसी के बरांडे में , धर्मशाला में , सराय में , मंदिर के बड़े वृक्षों के नीचे ही रात गुजारी जा सकती थी , अगर रास्ता भटक जाएँ तो वापसी मुश्किल होती थी।

बाबा ने एक लोटा , दो जोड़ी कपडे , एक डोरी , एक पोटली भुने चने , कुछ आटा  और नमक बस यही सामान  था , सात रुपये अंटी में बांध लिए , गांव भर के लोग उनसे मिलने आये , घर के सारे लोग रोकर उनके गले लग रहे थे , गांव के बाहर नदी तक सब लोग उन्हें छोड़ने आये , बाबा और दादी दौनों चले गए करीब दो माह तक , सब लोग उनकी बातें करते रहे जब खेतों का काम शुरू हुआ तब बाबा दादी का स्मरण थोड़ा कम हुआ , सन्देश भेजने का कोई साधन नहीं था तो बाबा दादी की कोई खबर ही नहीं थी।

ग्यारह महीने के बाद एक दिन बाबा दादी गांव आ गए , पूरा गांव उनके आने की ख़ुशी मना रहा था , गांव भर के लोगों के लिए बाबा कुछ न कुछ लाये थे , चारों तीर्थ का प्रसाद गांव भर में बांटा गया , घरवालों ने श्री मद भागवत कथा का आयोजन किया , पूरा गांव १५ दिन तक उत्सव मनाता रहा , बाबा दादी देवता की तरह पूजे जा रहे थे , एक आदमी के साथ गांव भर के लोग जुड़े रहते थे , एकता , अखंडता चरम पर थी आज भी यही अपनापन क्यों नहीं ? तीर्थों का घूमना आसान हो गया है लेकिन आध्यात्मिकता नष्ट हो गई है लोग सिर्फ तफरी के लिए जाते हैं , लोगों का संकल्प बदलना चाहिए।

विद्या शर्मा


मोटरसाइकिल

पचास के दसक में शादियां नाई , पंडित के भरोसे  ज्यादा होतीं थीं , अगर उनमें से कोई कह दे कि रिश्ता ठीक है तो , पक्का समझा जाता था , लोग पढ़े लिखे कम होते थे नाई अगर बोले कि लड़का २० ,२० का है , तो मान लिया जाता था २० बरस का होगा जबकि ४० बरस का होता था , क्योंकि नाई और पंडित ही रिश्ता तय कर देते थे , जब बरात दरवाजे पर आती थी तब पता चलता था कि लड़का २० का नहीं चालीस का है , गांव भर के लोग बारात में जाते थे , हमारे गांव की एक बारात में ससुर जी हरी लाल जी भी गए ,जब दरवाजा होने को आया तो लड़का बिदक गया कि हम तो मोटर साईकिल लेंगे , अब क्या था , घर वालों के साथ ही बाराती भी परेशान हो गए , लाख समझाने पर भी लड़का प्रीतम नहीं माना।

बात हरी लाल तक पहुंची तो , पहले लड़के को समझाईस दी कि पूरे गांव वालों की इज्जत का सवाल है , नाटक न करो , पर उसे लगा कि शादी में मांगी गई गिफ्ट अवश्य मिल जाती है , उस समय प्रीतम प्यारे को कोई होश नहीं था कि आगे क्या होने वाला है , तब गांव वालों ने निश्चय किया कि प्रीतम की जगह किसी और की शादी करवा देंगे लेकिन बिना शादी किये यहाँ से वापस नहीं जाना है , लड़की वाले क्योंकि दूर के रिश्तेदार ही थे तो पूरा साथ दे रहे थे , दो दिन तो बीत चुके थे , प्रीतम अपने दोस्त के साथ खेतों में भाग गया।

तब एक लड़के को गांव से बुलवाया गया क्योंकि वो बारात में नहीं आया था , उसे मोहर पहनाकर दरवाजा कराया गया , लड़की के माता -पिता अब उस प्रीतम से शादी नहीं करना चाहते थे , लड़की भी परेशान हो गई , क्या हो रहा है कुछ समझ नहीं आ रहा था , कभी मार -पीट की नौबत आ जाती , कभी बंदूकें तन जातीं , बड़ी मुश्किल से रघुवर को राजी किया और शादी के मंडप तक ले जाया गया।

प्रीतम के दोस्त ने बता दिया भाई !! अब तेरी शादी नहीं हो रही , गोली चल जाएगी , तू भाग यहाँ से , गांव से रघुवर को बुलाया है ,उसी से शादी होगी , मांग ले मोटर साईकिल , तेरे सर पर भूत सवार था , बाबा तुझे खोज रहे हैं , डंडा लेकर खेतों में गए हैं , प्रीतम अब तू तो , गया साले !! भाग जा यहाँ से। उधर गांव में रघुवर के साथ सन्नो का ब्याह हो गया , तीन दिन से बारात के साथ घर से बाहर रहते हुए सब लोग थक गए थे तो , पहली बस से ही सब लोग बहु को लेकर घर आ गए।  घर आकर औरतें तो रस्में पूरी करने में लग गईं लेकिन बाबा , दरवाजे पर डंडा लेकर बैठ गए , प्रीतम की आरती उतारने के लिए।

विद्या शर्मा


Sunday, March 1, 2015

पलायन

आज से करीब १२५ बरस पूर्व की बात है , बारिश नहीं हुई तो सब जगह सूखा हो गया , गांव भर के लोग शहरों की तरफ भागने लगे , हमारा गांव चावली भी अछूता नहीं रहा , पिताजी दो भाई थे लेकिन चाचा ताऊ मिलकर पांच भाई थे , २० बीघा जमीन उनका पेट नहीं भर सकी , सारा अनाज ख़त्म हो गया , पिताजी की माँ ने ताऊ के घर आटा या गेहूं लेने भेजा लेकिन ताई के मना करने पर , दादी ने आटे से निकली भूसी को छानकर आटा बनाया और बच्चों को खिला दिया , इस स्तिथि से १० बरस के पिता घबरा गए और उसी समय गांव छोड़ दिया जो ट्रेन मिली उसी में चढ़ गए , कानपुर पहुंचकर काम करना शुरू किया , मजदूरी करके ही घर का खर्च निकालना शुरू किया और सभी भाई बहनों को अपने पास ले आये।

अकाल के हालातों में भी गांव से बहुत से लोग कहीं नहीं गए , जिनके पास अनाज था।  शहर आकर पिताजी ने पहला काम किया जो पढ़ना चाहता था उसे पढ़ने भेजा , किसी की नौकरी की जुगाड़ लगाई , तब बड़ी दादी ने भी अपने बेटे को पिताजी के पास भेज दिया , पिताजी की शादी के बाद १० बच्चे हुए , मैं सबसे बड़ी थी , जब मुझे अकल आई तब पिताजी बड़ी मिठाई की दुकान सँभालते थे , घर का खर्च बहुत ही अच्छा चलता था , दस दुकान के वे मालिक थे।

कभी -कभी बुरा समय हमारे लिए नए रस्ते खोलता है , सब कुछ बुरा है ऐसा सोचकर अपने हालात बिगाड़ने नहीं चाहिए , अच्छा समय भी आता है , उसके लिए परिश्रम और इंतजार करना चाहिए।

विद्या शर्मा 

प्रवासी भारतीय

बरसों पुरानी बातें हैं लेकिन आज भी याद आती हैं तो कल की सी बातें लगतीं हैं , बाबा यानि ससुर जी के चचेरे भाई मजदूरों के काफिले के साथ काम की तलाश में रंगून चले गए थे , काफी बरस तक वहां रहने के बाद वे भारत आये और फतेहाबाद अपने मूल निवास स्थान गए लेकिन वहां किसी ने उन्हें स्वीकार नहीं किया क्योंकि उनकी शादी वहीँ की स्त्री से थी , बाबा के पास आये तो उन्होंने अपने ही घर में उन्हें रहने की आज्ञा दी , जमीदार थे , घर में सबसे बड़े थे , कोई उनकी आज्ञा टाल नहीं सकता था , कई बरसों तक बलदेव जी वहीँ रहे जब जमा पूंजी ख़त्म हो गई तब वापस रंगून चले गए , वहां से सूरीनाम चले गए , कभी -कभी बाबा को खत लिखा करते थे , बाबा भी उसका जबाव दे दिया करते थे , जब बलदेव जी की मृत्यु हुई तब उनके बच्चों को पता चला कि भारत में उनके रिश्तेदार भी हैं और उनसे पत्राचार भी है।

बलदेव जी के बिस्तर के नीचे भारतीय पत्रों का जखीरा मिला था , उनके बच्चे जो कोई डॉक्टर था , कोई व्यापारी सब अचंभित थे लगभग ५० बरस बाद उनके बेटे ने मेरे पति हर चरण लाल जी से संपर्क साधना शुरू किया , अपनी दिनचर्या की भागमभाग में भूल जाया करते थे कि कोई प्रवासी भारतीय हमारे बंधू भी हैं , तभी उन सभी बहन भाइयों ने निश्चय किया कि भारत जायेंगे और सब लोग एक साथ पति के ऑफिस पहुँच गए क्योंकि वे अक्क्सर वहीँ के पते से पत्र डालते थे , उनकी बड़ी बहन जिसने कभी भी मेरे पति को नहीं देखा दूर से ही उन्हें पहचान लिया और गले मिलकर देर तक रोतीं रहीं , तब लगा कि दूरियां भी हमारी जड़ों को उखाड़ नहीं सकती।

शाम तक उन्हें घुमाकर घर ले आये , खाना खाकर वे अपने होटल चले गए , हफ्ते भर तक पति अपने साथ उन्हें घुमाते रहे और फिर जाने का समय भी आ गया , जाने से पहले बड़ी बहन ने घर की मिटटी अपने रूमाल में बाँध ली , इसे मंदिर में रखूंगी , मेरे पूर्वजों के रज कण हैं , सभी भाबुक हो गए।

विद्या शर्मा 

परीक्षा

सन १९४५ में भी लड़कियों के लिए शिक्षा का कोई प्रबंध नहीं था , घर से सात से दस किलोमीटर दूर तक स्कूल होते थे , वहां लड़कियां नहीं जा पातीं थीं , ५ वीं कक्षा तक की पढाई तो घर के पास हो जाती थी लेकिन आगे पढ़ना हो तो मुश्किल होता था , पिताजी के दोस्त के कहने पर विद्या को भी जुहारी देवी गर्ल्स इंटर कॉलेज में बड़ी मुश्किल से दाखिला मिल गया , घर से सात किलोमीटर आना जाना कष्ट दाई होता था , विद्या की सहेली सावित्री भी वहीँ पढ़ने जाती थी तो पिताजी का कहना था , जब वो जा सकती है तो तुम क्यों नहीं जा सकतीं। विद्या तो कठपुतली जैसी सावित्री के पीछे चलती जाती थी उसे रस्ते का कोई ज्ञान नहीं था।

अंग्रेजी की पढाई बच्चों के लिए मुश्किल होती थी यदि घर में कोई पढने वाला न हो तो , विद्या भी उन्ही बच्चों में सुमार थी जो ग्रेस लेकर पास हो जाते थे , किसी तरह गाड़ी चल रही थी , उस समय लड़कियों के लिए गृह विज्ञान विषय को अधिक रूचि लेकर पढ़ाया जाता था , स्कूल में कुकिंग का पूरा सामान ले जातीं थीं , सिलाई -कढ़ाई , बुनाई सब सिखाया जाता था , प्रेक्टिकल होने से पहले ही बता दिया जाता था कि क्या बनाना है , वही सामान स्कूल लेकर आती थीं लड़कियां और टीचर को खिलाया जाता था।

जब विद्या को प्रयोगात्मक परीक्षा देनी थी ,तब उसकी बड़ी बहन मणि की शादी हो रही थी किसी को चिंता नहीं थी कि बच्चे क्या पढ़ रहे हैं या किसकी परीक्षा है , गाजर का हलवा बनाने को मिला था तो किसी पडोसी से गाजर मंगवाई तो वह काली गाजर ले आया , अब क्या करे ? किसी तरह माँ से पूछकर हलवा बनाया गया , ऊपर से थोड़ी मेवा डालकर विद्या स्कूल ले गई , सारे बच्चे टीचर के पास जाते तो उन्हें मुबारकवाद मिलती कि खाना अच्छा बना है लेकिन विद्या की तो दम निकला जा रहा था क्योंकि हलवा काला जो था , क्या करती आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे , सहेलियां पूछ रही थीं क्यों रो रही हो ? तो क्या जबाव दे ,तब सावित्री आई और बोली - पगली जो है उसे ही दिखा कर आ , सब ठीक होगा , बोलना मैंने ही बनाया है , बता देना कैसे बनाया है।

हिम्मत से टीचर के पास विद्या गई और कटोरी का हलवा रख दिया , देखते ही टीचर बोली - अरे !! काली गाजर का हलवा वाह ! और सभी साथी टीचर को खाने के लिए दिया , सभी ने बहुत तारीफ की , विद्या ख़ुशी मैं भी रो रही थी , जान में जान आई , टीचर ने पूछ लिया कैसे बनाया था , सब बता दिया उस दिन सबसे ज्यादा नंबर विद्या को ही मिले। इसी तरह जब वार्षिक परीक्षा देनी थी तब , लौकी की सब्जी , रायता और खीर बनाई थी क्योंकि विद्या के पास सिर्फ लौकी ही उपलब्ध थी जब एक सब्जी से खीर , रायता और सब्जी बनाकर टीचर को दिखाया तो दंग रह गईं , तब भी विद्या सबसे अधिक नंबर ले गई , टीचर ने सभी लड़कियों को बताया कि रसोई का कौशल तो तभी है जब हम एक ही वस्तु से अधिक व्यंजन बना सकें , विद्या मन ही मन सोच रही थी ये सब मैं माँ की वजह से कर पाई क्योंकि माँ ही हमें खाना बनाने के लिए नए तरीके सिखाती रहतीं हैं।

विद्या शर्मा 

Saturday, February 28, 2015

देश -प्रेम

गुनिया की शादी जमीदार परिवार में हुई थी , १९६० में जमीदारी तो रही नहीं लेकिन उसकी ठसक बची हुई थी , दो की जगह एक सब्जी से खाने की आदत बन गई थी , रहन -सहन सब राजसी था ,लड़कियों की पढाई के लिए घर पर ही व्यवस्था की जाती थी , कॉलेज भेजने के लिए साधन उपलब्ध नहीं थे , गांव तक बस नहीं आती थी , स्वयं जा नहीं सकते थे उसके लिए वहां की सुविधा भी नहीं थी , इसलिए अधिकांश लड़कियां घर के काम में ही हाथ बटाती थीं , गुनिया की जब शादी हुई तब वो १७ बरस की थी , १८ बरस की युवा बिटिया घर में कुवारी थी , पर जमीदार साब को चिंता नहीं थी।

गुनिया की माँ ने बचपन में ही समझा दिया था कि ससुराल ही तुम्हारा घर है , वहीँ से लड़की की अर्थी उठती है , यहाँ आने पर घर के एक पुरुष से मिलना हुआ जो दो बार युद्ध में भाग ले चुके थे और अपने मैडल एक थैले में हर समय साथ रखते हैं , न जाने कब जरूरत पड़ जाय , जब अपने गांव लादूखेड़ा आते तो हम सबसे मिलने भी अवश्य आते , जब भी समय मिलता युद्ध के किस्से सुनाते रहते , कभी जब जरूरत होती तो खलिहान पर भी सोने चले जाते , उनके पास बन्दूक रहती थी , गांव वाले थोड़ा डर कर रहते थे , हर बार की छुट्टियां हम सबके पास ही निकालते थे , बच्चे दौड़ -दौड़ कर उनके काम करते थे।

मंगल बाबा एक बार नहीं आये तो सभी उनकी याद कर रहे थे , उनकी शादी नहीं हुई थी इसलिए हम लोग ही उनके बच्चे थे , एक बार आर्मी भर्ती का विज्ञापन निकला तो बाबा ने फार्म लेने के लिए लाइन में भूखे प्यासे शाम कर ली , जब नंबर आया तो बाबू से बोले - बेटा !! एक फार्म देना , बाबू ने बाहर झांक कर देखा तो एक बुजुर्ग खड़े हैं , आपकी उम्र आराम करने की है और उन्हें फार्म नहीं दिया गया। घर तो आ गए लेकिन किसी को नहीं बताया क्या हुआ था , थोड़े दिन रहकर अपने गांव चले गए।

दुसरे बरस फिर जगह निकली और बाबा फार्म लेने चले गए क्योंकि गांव में उनका मन नहीं लगता था , पहला काम किया की सर के बाल कटवा लिए , दाढ़ी मूछ साफ़ करवा ली , टोपी लगाकर लाइन में लग गए और कड़क आवाज में कहा -एक फार्म दो , बाबू ने बाहर झाँका , और बोला -आप अंदर आइये , आपको यहीं फार्म मिलेगा ,जब बाबू ने देखा कि बाबा , ने हुलिया ही बदल दिया है तब बड़े अदब से बोला - आप क्यों आर्मी में जाना चाहते हैं , अब आपकी उम्र नहीं वहां जाकर लड़ने की , तब बाबा ने उसे अपने सर्टिफिकेट और टंगे दिखा दिए और बोले अब तो फार्म देगा , बाबू , घबरा गया उठकर सलूट किया और बोला - अब देश की रक्षा करने के लिए हम हैं आप आराम करें , निश्चिन्त रहें।


शाम को बाबा घर आये और दर्द भरी कहानी सबको सुना दी क्योंकि सभी पूछ रहे थे बाल क्यों हटवाए ? अब हर सवाल का जबाव क्या देते तो बताना ही पड़ा , बाबा तो अब नहीं रहे लेकिन उनकी देश भक्ति आज भी हम सभी को उन्हें सलूट करने को बाध्य करती है।  बहुत मुश्किल से मिलते हैं ऐसे जाबांज।

विद्या शर्मा 

Friday, February 27, 2015

पहली बस यात्रा

करीब ४५ बरस पहले की बात है , मैं , अपनी छोटी बहन कामायनी और उसके दो बरस के बेटे के साथ गाजियाबाद के लिए निकल पड़े , क्योंकि हमारे बड़े भाई का बच्चा गुजर गया था , उनके पास जाना जरूरी था , हम आगरा से बस में सवार हुए बस स्टैंड के लिए जो तीन किलोमीटर दूर था घर से , वहां पता चला कि खुर्जा के लिए बस है , गाजियाबाद की बस का अभी कोई पता नहीं कब आये , हम लोग उसी बस में बैठ गए , खुर्जा पहुंचकर पता चला गाजियाबाद की बस खड़ी है तब हम उसमें बैठ गए , हमारे तो होश उड़े हुए थे पता ही नहीं था कहाँ से कहाँ जायेंगे तो पास रहेगा , बच्चा साथ था , सभी राहगीरों ने हमारा साथ दिया और हम भाई के घर तक पहुँच गए। 


दो दिन वहां रुकने के बाद हम लोग वापस जाने का सोचने लगे , भाई भाभी बहुत दुखी थे , उनका बच्चा नहीं रहा था , लेकिन ईश्वर की इच्छा के सामने क्या कर सकते थे , हम लोग आगरा के लिए निकल गए , वहां से भाई ने बिठा दिया था और समझा दिया था कि कहाँ उतरना है , लेकिन अलीगढ आने पर हमने विचार किया कि कौन रोज निकलना होता है चलो बुआजी से भी मिलते चलें , हमारे पास उनका पता भी नहीं था ,बस इतना मालूम था कि उनके यहाँ ताले बनाये जाते हैं , हम अलीगढ़ पर उत्तर गए वहां से नईबस्ती के लिए रिक्शा किया लेकिन पता चला कि वहां सुरेश चन्द्र शर्मा नाम का कोई व्यक्ति नहीं रहता , रिक्शे वाला हमारे साथ ही घूमता रहा पर कुछ भी पता नहीं चला। 


तभी एक खद्दरधारी  व्यक्ति हमारे पास आये और हमारी परेशानी पूछने लगे , शाम होती जा रही थी हम अपने निर्णय पर दुखी हो रहे थे , बहुत समय से आप लोग परेशान हैं ,बताएं क्या मसला है , तब हमने उन्हें सारी कहानी बताई , सज्जन बोले - आप यहीं बैठें , मैं अभी पता लगाकर आता हूँ , नेता जी पहले तो बाजार गए ,वहां पता लगाया कि ताले कहाँ बनते हैं , पता चला कि अब उनका काम बदल गया है , बस्ती में नहीं कटरा में रहते हैं। पता लगाने में उन्हें देर हो रही थी , हम लोग परेशान थे कि आगरा भी जाना है , क्या करें ? तभी सोचा कि वापस चलते हैं , बच्चा भी दुखी करने लगा था और हम आगरा की बस में बैठ गए जो आखिरी बस थी। 


तभी , भागते हुए नेता जी आये और बोले - आपके फूफाजी का पता लग गया है , नीचे उतरें , कल चली जाना , मैं स्वयं छोड़कर आऊंगा , चिंता न करें , हमारी टिकिट वापस करवा दी , हमें एक दुकान पर बिठाकर बोले -मैं आपके घर से किसी को बुलाकर लता हूँ , आप यही बैठें , १० मिनट बाद बुआजी के बेटे के साथ वे सज्जन आये और पूछा -इन्हें पहचानती हो या नहीं , हमारे साथ घर तक गए , अगर जरूरत हो तो ,मैं ,दुकान पर ही मिलूंगा आ जाना। हम सोच रहे थे ईश्वर ने कितना ख्याल रखा हम लोगों का , पहली बार बाहर निकले थे , सभी भले लोग मिले , कोई परेशानी नहीं हुई। हम इतने मूर्ख थे कि उनका धन्यवाद भी नहीं किया , बरसो बीत गए आज भी याद आते हैं वो पल ,जब हम घर से निकल गए थे।  सभी ने अपने बच्चों सा हमारा ध्यान रखा था। 

विद्या शर्मा 

परिवरिश

मणि हमारी बड़ी बहन राजस्थान में रहती थीं , प्रतिष्ठित वकील साब के परिवार में ब्याही थीं , उनके पति भी वकील थे पर उनकी वकालत बिलकुल नहीं चलती थी , परिवार का पूरा खर्च हमारे ताऊजी उठाते थे क्योंकि मणि उनकी अकेली संतान थीं , बड़े लाड -प्यार में पली थीं , पढाई के अलावा सारे काम वो कर लेती थीं , खाना बहुत ही स्वादिष्ट बनाती थीं , हम सब लोग अक्क्सर उनके बनाये खाने से खुश होते थे , कोई अपना - पराया नहीं था , सन १९५० में उनकी शादी कर दी गई जब कभी मौका मिलता हम लोग भी मणि दी के पास घूमने आते थे ,


एक बार उनकी बेटी के जन्म दिन पर हम लोगों को जाने का अवसर मिला , वहां संगीत का आयोजन रखा गया था जिसमें उनकी एक सहेली के साथ १२ साल का लड़का भी था जो बहुत अच्छी ढोलक बजा रहा था और बहुत ही मधुर स्वर में गाने भी गा रहा था , हम लोग बहुत ही अचम्भित थे क्योंकि हमने पहली वॉर किसी लड़के को इस तरह बजाते गाते सुना था , शारदा के पास लड़का बचपन से ही था , छोटे मोटे काम करता था और संगीत सीखता था , भारतीय त्योहारों में गाने वाले , होली , दिवाली , शादी , बधाई , भजन जो चाहो उससे गवा लो , सब लोग उससे परिचित थे , शारदा को योगी की वजह से सब जानते थे , सबके आकर्षण का केंद्र बन जाता था।


हमारे गांव चावली के पास एक गांव नगला लाले था , वहां का सैनिक परिवार उस लड़के की ग्रहण करने की क्षमता से बहुत प्रभावित हुआ , मेजर कुमार अपनी पत्नी के साथ आये हुए थे , शारदा से उस लड़के को अपने साथ ले जाने का आग्रह किया , हम इसको पढ़ाना चाहते हैं , इसकी नौकरी लग जाएगी तो अच्छा रहेगा सभी इस प्रस्ताव का समर्थन किया और काफी सोच -विचार के बाद कुमार योगी को अपने साथ लेन में सफल हो गए , कुमार ने उसे अंग्रेजी स्कूल में दाखिला दिला दिया , बच्चा बुद्धिमान था , सब कुछ बहुत अच्छी तरह से सीख लिया , कोई समझ ही नहीं पाता था कि योगी इनका अपना बेटा नहीं है , १२वी पास करने के बाद उसकी नौकरी लग गई , कुमार का घर योगी भरद्वाज के संगीत प्रतियोगिता में पाये उपहारों से भरा हुआ था , अब तो योगी भी भूल चूका था कि वो कहाँ से आया है कौन है ,

२० साल बाद एक बार फिर मणि दी की बेटी की शादी में जाने का मौका मिला , कुमार दंपत्ति अपने होनहार बेटे योगी के साथ वहां आये हुए थे , शारदा तो उसे देखकर खुश थी , हम लोग अचम्भित थे कितना रौबीला युवक बन गया था योगी , सभी उसके सुखद भविष्य के लिए खुश थे। अब तो वो भी देश सेवा के लिए समर्पित था।

विद्द्या शर्मा 

Thursday, February 26, 2015

वारा देवी

कानपुर के एक कस्वे में दो मंजिले घर में ताई , चाची के बच्चों के साथ हम १५ बच्चे रहते थे , पास में ही थाने में ताई की सहेली के पति दरोगा के पद पर पदस्त थे , इसलिए हम लोग कभी -कभी थाने भी जाया करते थे , हमारी खातिरदारी सिपाही किया करते थे , दरोगानी को हम लोग मौसी कहते थे , बड़ी घमंडी थीं , उनके बेटे का नाम विजय था हम उससे बात नहीं करते थे , वहां से करीब ६ किलोमीटर दूर वारा देवी का मंदिर था , नव दुर्गा के समय वहां मेला लगता था , सब लोग पैदल ही वहां जाया करते थे , इसबार ताई के साथ माँ भी चलने को तैयार हो गईं , यातायात के कोई साधन नहीं थे , जंगल में लोग जाया करते थे ,

कभी मेला नहीं देखा था इसलिए हम लोग बहुत ही उत्साहित थे , कोई थकन भी नहीं लग रही थी , सभी लोग देवी की पूजा के लिए सामग्री ले जा रहे थे , कहीं खाने की चीजें बिक रही थीं कहीं घर ग्रहस्ती की वस्तुएं बिक रही थीं , किसी ने अपनी जीभ में आर -पार तार डाल रखा था , कोई पीठ पर कोड़े बरसा रहा था , क्या अजीब सा मेला था , वो सब देखकर हम लोग व्याकुल हो गए और पिताजी से घर जाने के लिए बोलने लगे , देवी जी के पास दर्शन किये तो वहां पुजारी जी सभी को भस्म लगा रहे थे , हम आश्चर्य से सब देख रहे थे , आस्था का पर्व चल रहा था , श्रद्धा और भक्ति का पर्व था , मिठाइयों , खिलौनों का जश्न हम बच्चों के लिए था ,

आज सभी सुविधाएँ देवी जी के स्थल तक जाने के लिए हैं , लोगों की आस्था बदली नहीं है , आज भी हजारों लोग जाते हैं , हम बुड्ढे हो गए पर वारा देवी का मेला हमारी यादों में आज भी लगता है।

विद्या शर्मा 

पोखर

जेठ की गर्मी में जब घर का काम काज ख़त्म हो जाता तब , घर की बुजुर्ग दादी बुआ , ताई ,चाची सब सूत का खेस जमीन पर बिछा कर ही खर्राटे लेने लग जाती थीं , गांव में अधिकतर खेस का प्रयोग ही किया जाता था क्योंकि वह गांव के जुलाहे द्वारा ही बनाये जाते थे।  उसी समय हम बच्चों को बाहर जाने का मौका मिलता था , चुपके से सबकी आँख बचाकर बच्चों की टोली बाहर जाने के लिए तैयार हो जाती थी , हमारे चबूतरे पर हर समय भीड़ रहती थी क्योंकि पक्का बना था और नीम के पेड़ से ठंडी हवा जो आती रहती थी , चबूतरे पर एकत्र होकर यह निश्चय किया जाता था कि आज क्या खेलना है , कभी आँख मिचौली , कंकड़ खेलना कभी बम्बे में नहाना और कभी पोखर पर जाकर मस्ती करना यही मुख्य खेल थे।


बच्चों को सबसे ज्यादा मजा तो पोखर पर ही आता था , वहां एक आम का पेड़ था , उस पर बड़े मीठे आम आते थे , हालाँकि वहां एक रखवाला रहता था जो पेड़ के नीचे खटिया बिछाकर सोता रहता था , कभी जब आम नीचे गिर जाते तब उन्हें उठाकर स्वाफी में बांध लेता और सो जाता , गांव के घरों की मरम्मत करने के लिए इसी पोखर की मिटटी ली जाती थी इसलिए वहां किसी न किसी का आना -जाना लगा रहता था , हम लोग पास के खेतों में छुप जाते या कुछ खेलने का नाटक करते और धीरे से पेड़ पर चढ़कर कच्चे आम तोड़ते , जैसे ही उसकी आँख खुलती हम पकडे जाते और सरे आम छीनकर डंडे से मारने का प्रयास करता , हम लोग एक दुसरे को छुड़ाकर भागते और उस बुड्ढे को कोसते जाते , एक आम के लिए इतनी मेहनत करते कि पूरा दिन ही निकल जाता योजना बनाते हुए।

कभी कभी जब रखवाला नहीं होता तब तो मौज ही होती सारे आम बटोरकर घर की तरफ दौड़ लगा देते , कभी जब ताऊजी या भाई के साथ पोखर पर जाते तब कुछ नहीं बोलता और सारे आम थैले में भर देता , दुपहर होते ही रखवाला बदल जाता था , आज भी गांव भर की भैसें वहीँ पानी पीती हैं लेकिन अब कोई मिटटी से घर नहीं सुधारता , आम का पेड़ भी बूढ़ा हो गया है लेकिन फल अभी भी देता है , आज भी गांव भर के बच्चे वहीँ खेले रहते हैं , लेकिन जो मस्ती हम बच्चों ने ५० वी सदी में की अब कोई नहीं कर सकता। पोखर भी तो सूखकर गड्डा बन गई है।

विद्या शर्मा 

जूते

उत्तर -प्रदेश का गांव राजपुर हम लोग किसी रिश्तेदार की शादी में ताई के साथ गए थे , उस समय मैं , आठ बरस की रही होउंगी , बड़ा सा कच्चा घर था , आँगन इतना बड़ा था कि पूरी बारात एक साथ खाना खा ले , लड़की की शादी में उस दिन दावत थी , पहले तीन से चार दिन में बारात विदा होती थी। दावत चल रही थी जिसमें कई मिठाइयां , पूरी , सब्जी , दही बूरा , रायता सब शामिल था , आने वाले लोग ब्लास्त से नाप कर पूरियां खाते थे , दावत खा कर लोग उठे तभी , शोर मचा कि किसी का जूता चोरी हो गया , जो उस समय के हिसाब से कीमती था।

जूता खोने से रिश्तेदार तो जैसे आपे से बाहर होते जा रहे थे , दुःख इसलिए अधिक था क्योंकि जूता पड़ोस के गांव के एक ऐसे लड़के के थे जिसकी शादी दस दिन पहले ही हुई थी , जूता मांगने वाला उसका दूर का भाई था , उस समय जूता उधार मांग कर काम चलाया जाता था , कभी छोटा जूता या बड़ा जूता भी चल जाता था , जूते उधार मांग कर स्वाफी में लपेट कर उत्सव तक जाते थे , वहीँ जाकर पहन लेते थे , हर कोई की हैसियत नहीं होती थी कि जूते पहन सके , इसलिए यूँ ही काम चलाया जाता था।  दूसरे का जूता होता था तो हिफाजत भी की जाती थी , जूता क्या खोया कोहराम मच गया , सुख -चैन , खाया पीया सब बेकार हो गया , सब जगह खोजने के बाद भी जूता नहीं मिला।


जिसने जूते पर हाथ साफ़ किये थे वो तो , पहले ही निकल गया था , लड़की के भाई ने आस्वासन दिया हम जूते का पता लगवाएंगे , जूता अपना होता तो और बात थी , मांगे का जूता बेचैन किये था , सब जगह उसे जूता ही नज़र आ रहा था , किसी से कह भी नहीं सकता था कि जूता मेरा नहीं किसी और का है। जूता मिलना तभी संभव था जब उसी गांव में किसी की शादी हो , सबको पता था जूता चोरी करना कोई हंसी नहीं है , लड़की के भाई ने अपने दोस्तों को खोज में लगा दिया , हिदायत दी गई कि जूता देखते ही बताया जाय।

दो माह के भीतर ही एक शादी का आयोजन होने वाला था , सबकी नज़रें लगी थीं कि कौन जूते पहनकर आता है , गांव के जमीदार के घर शादी थी , नए जूते खरीदने की औकात ही नहीं थी तो खोज बीन ही की जा सकती थी , दावत शुरू हो चुकी थी , उसकी निगाहें जूतों को ही खोज रहीं थीं , तभी भाई के दोस्त ने बताया भाई !! जूते तो जमीदार का रिश्तेदार पहने है , तभी यह तय हुआ कि चुपचाप जूते लेकर जाओ जिसके थे वापस करो , स्वाफी में जूते बांधकर दावत का भरपूर मजा लिया और गांव जाकर दोस्त को जूते वापस किये क्षमा याचना के साथ। उस दिन से यह गांठ बाँध ली कि अब किसी से उधार कुछ भी नहीं लिया जायेगा। इस तरह जूतों का किस्सा ख़त्म हुआ।

विद्या शर्मा




Wednesday, February 25, 2015

विद्या शर्मा की कहानियाँ - सायकिल की खरीदी

परीक्षा समाप्त होते ही हम लोग पैतृक गांव चावली चले जाया करते थे , पिताजी ही छोड़कर जाते थे , गांव में ताऊजी राम दयाल शर्मा अपनी पत्नी के साथ रहा करते थे , ताऊजी का एक बेटा था जो कानपुर में हमारे साथ ही रहता था , वहीँ पढ़ते भी थे हमें गांव में दो महीने के लिये छोड़ दिया जाता था।

एक दिन सो कर उठे तो पता चला कि ताऊजी टूंडला गए हैं , उनके जिगरी दोस्त पास के गांव चिरौली से आये थे ,आज उन्हें सायकिल खरीदनी थी ,उस समय न तो सड़क थीं और न ही आने जाने के लिये कोई साधन होते थे अतः सुबह अँधेरे ही निकलना पड़ता था।  अगर पहले से पता हो कि जाना है तो दो चार पराठे अचार के साथ रख लिए जाते थे लेकिन ताऊजी को अचानक जाना पड़ा तो नास्ता रखने का प्रश्न ही नहीं होता। गर्मी से बचने के लिए सुबह ही निकल गये।

धूप चढ़ते ही वे टूंडला पहुँच गए , दुकान अभी नहीं खुली थी तो किसी पेड़ के नीचे विश्राम करना पड़ा , हवा का झोंका लगा तो सो गए , गिरिवर जी ने करबट ली तो देखा ताऊजी के अंगोछे पर कुत्ता सो रहा है , अरे  !!! ठेकेदार !! उठो कुत्ता तुम्हारे संग सो रहो है ,ताऊजी गांव की हाट का ठेका लेते थे इसलिये सभी लोग उन्हें ठेकेदार कहते थे , दोनों सायकिल की दुकान पर पहुँच गए , कीमत १३ रुपये जो आठ साल पहले १० रूपये थी , अच्छा अंधेर है हमारा भाई १० की ले गया था। गिरिवर ने मन पक्का किया और सायकिल ले ली।

सायकिल कसाई गई क्योंकि सभी हिस्से अलग -अलग ही मिलते थे , रसीद भी दे दी गई , सायकिल लेकर बाहर आ गए , ताऊजी खुश थे कि अब पैदल नहीं चलना पड़ेगा ,चलो गिरिवर !! जल्दी गांव पहुंचे वरना धूप तेज हो जाएगी ,हाँ -और सायकिल को सर पर रखकर चल दिए , अरे !! ये क्या करते हो ? सायकिल पर ही चलते हैं , का कह रहे हो ठेकेदार !!  नई सायकिल है ,चलो बेग , और आगे -आगे चल दिए ताऊजी मन मारकर उनके साथ चल दिए।


तीन चार किलोमीटर चलने के बाद एक गांव मैं ही गिरिवर रुके ,वहां पानी पीया थोड़ी देर विश्राम किया , सायकिल देखने के लिए वहां भी भीड़ लग गई , गांव वाले भी बोल रहे थे सायकिल से जाओ पर गिरिवर जी पर कोई असर नहीं पड़ा , नाय सायकिल के पहिया अभी ते घिस जायेंगे ,वे नहीं माने। सायकिल सिर पर रखकर गिरिवर आगे -आगे ताऊजी पीछे -पीछे थके हुए चल रहे थे। जब गांव के खेत दिखे तब ताऊजी ने कहा अब , तो सायकिल से चलो , लोग क्या कहेंगे , पर गिर्रा तो फिर भी न माना और घर के चबूतरे पर सायकिल उतार कर निढाल होकर गिर गए , चिरौली तो अभी और चार किलोमीटर जाना था तो गिरिवर वहीँ पसर गए। चबूतरे पर लोगों की भीड़ थी सायकिल देखने के लिए।

विद्या शर्मा