Tuesday, March 3, 2015

tabadala

तबादला हमारा परिवार बहुत बड़ा था , पिताजी चार भाई थे , उनके भी चचेरे भाई बहन थे , इस तरह करीब ७० लोगों का कुटुंब था , पिताजी गांव का घर छोड़कर सहर आ गए थे , जब थोड़ा पैसा बना लिया तब , बच्चों को अपने पास बुला लिया और निश्चय किया कि बच्चों की शादियां जल्दी करेंगे खासकर लड़कियों की , हमारे पिताजी के खानदान में दो पीढ़ियों से कोई कन्या पैदा नहीं हुई थी तो देवी जब हुई तो घर भर में ख़ुशी मनाई गई , फिर तो कई देवियों की बाढ़ आ गई , कमला , शारदा , सत्या , कात्यायनी , माया , और शैलजा आ गईं, लेकिन पिताजी कहते थे कि लड़कियों के आने से मेरा कारोबार बढ़ता ही जा रहा है . देवी ने दसवीं पास कर ली थी तभी उसके रिश्ते आने लगे , गांव के जमीदार परिवार से एक बेटा लिपिक था , उसके साथ देवी का ब्याह हो गया , देवी खुश थी लेकिन वहां जाकर पता चला कि दकियानूसी लोगों के बीच जाकर फंस गई है , औरतों के सामने भी पर्दा करना पड़ता था , सारे दिन काम करो , किसी से न बोलना न घूमना , सब कुछ पीहर में छूट गया , देवी फिर भी सब कुछ अच्छी तरह कर रही थी , पति , सुबह जाते तो रात को ही वापस आते , न घर वालों से कोई वास्ता और न पत्नी से , बस बच्चे पैदा करो खाओ और मस्त रहो , पूरा जमीदारी का ठस्का रहता था लेकिन अब ,तो जमीदारी भी नहीं रही थी . खानदान की लड़कियों तक से बात करने की मनाही थी , इसीतरह चार बच्चे भी हो गए , देवी सोचती थी संजय का तबादला क्यों नहीं होता , तब पता चला कि अपने साहब से कहकर तबादला रुकवा लेते हैं , देवी रोज ईश्वर से प्रार्थना करती थी कि पति का कहीं तबादला हो जाय तो अपने तरीके से थोड़ा जी सके , एक दिन नाराज होकर देवी ने कह दिया कि तुम्हारे बॉस से मिलूंगी , कह दूंगी मुझे तबादला चाहिए तब पति महाशय थोड़ा घबरा गए और घर के पास ही मेरठ में तबादला करवा लिया , एक हफ्ते बाद आये और सामान लेकर वापस चले गए , देवी की कामना तो जहाँ थी वहीं रह गई लेकिन मन मसोस कर रह गई . करीब १५ दिन बाद पति देव ,घर आये तो पता चला उनकी तबियत ख़राब हो गई है , एक हफ्ते आराम करने के बाद देवी को लेकर जाने का मन बना लिया , देवी दो बच्चों के साथ जाने को तैयार हो गई , दो बच्चे बुआ के पास छोड़ दिए ,सोचा था बच्चों को बाद में बुला लेगी , मेरठ जाकर थोड़े दिन अच्छा लगा क्योंकि नई जगह सामान जुटाने मे समय निकल गया , फिर वहीं घर का काम और बच्चे , देवी ने सोचा था ईश्वर ने उसकी कामना पूर्ण की है तो सत्य नारायण की कथा पढ़ लेगी , अच्छे दिन का इंतजार कर ही रही थी तो पता चला कि कल ही पूर्णिमा है तो किताब लेकर कथा की तयारी कर ली , शाम को देवी खुश थी अब पति को प्रसाद देगी और बता देगी कि कथा पढ़ी थी लेकिन पति संजय ने आते से ही बता दिया कि उसका तबादला वापस घर हो गया है , वो बहुत खुश था ,देवी कभी प्रसाद को देख रही थी कभी संजय को , क्या करे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था , आँखों में आंसू भर आये थे , भगवन की लीला समझ कर सामान पैक करने का सोचने लगी . विद्या शर्मा

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