Sunday, March 14, 2010

सागर

में , सागर हूँ ,
मुझमें 
असीम गहराई 
और अनंतता है ,
असंख्य रत्नों से भरा हूँ ,
युगों पूर्व से ,
जब भी ,
तुमने मंथन किया है ,
अनेकों उपहार दिए हैं 
सीप और मोती मेरी 
संतानें हैं ,
तुम चाहो तो 
खोज लो ,
कुछ और भी |
उसके लिए 
मुझे समझना होगा ,
मेरी तली में ,
आना होगा |
जो , शायद 
तुम्हें कठिन लगे |
साहस  करो 
कुछ भी मुश्किल नहीं है |

विद्धया शर्मा ..

2 comments:

संजय भास्कर said...

में , सागर हूँ ,
मुझमें असीम गहराई और अनंतता है ,असंख्य रत्नों से भरा हूँ ,युगों पूर्व से ,जब भी ,तुमने मंथन किया है ,अनेकों उपहार दिए हैं सीप और मोती मेरी संतानें हैं

इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

संजय भास्कर said...

Dear
Renu Sharma ji
i m sanjay customer care officer in Tat indicom Haryana circle
sath me mass c.mmunication bhi kar raha hoon.
kabahi -2 kavitaye or lekh bhi likh lete hoon
maine aapka blog dekha pritibimb
bahut hi sunder hai..
bahut hi sunder likhti hai aap
dusi baat aap meri nanihal ki hai..
m.p mughe suru se hi pasanda hai..kasskar hill area..
ढेर सारी शुभकामनायें.

plz vist my blog
Sanjay
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

Regards

Sanjay Bhaskar

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': 09254102333 | * sanjay.kumar940@gmail.com

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