Friday, March 5, 2010

तलाश

सोते - जागते  देखे 
मधुर - डरावने 
धुंधले 
स्वप्नों की 
मुझे ,
तलाश है ,
दूर बादलों में 
गुम हुए 
साए से ,
उन , सपनों की 
मुझे तलाश है ,
जो , 
जागते हुए भी 
सोये हुए अधरों पर 
आई ,
मुस्कान को 
चुरा ले गए 
उस , 
अस्पष्ट अहसास की 
मुझे तलाश है ,
शजों को झंकृत कर 
स्वरों की 
तान झेड़ने से 
घायल हुए 
पोरों की 
मीठी सी 
चुभन की मुझे ,
तलाश है ,
उन ,
सपनों को
 जीना चाहती हूँ ,

विद्धया शर्मा ...

1 comment:

Rakesh said...

दूर बादलों में
गुम हुए
साए से ,
उन , सपनों की
मुझे तलाश है ,
vidhya aapki kavita mein jeevan ki talash hai admya lalak hai ,jijivisha hai ..yehi es kavita ki khoobi hai ....