Thursday, March 25, 2010

गंगा

ऊँचे -ऊँचे शिखरों पर 
श्वेत , धवल हिम पर 
उतरती सूर्य की 
रश्मियाँ ,
जहाँ इठलाती हैं ,
शशि की कलाएं 
अंगडाइयाँ लेती हैं ,
निशब्द निशा का 
मौन तोडती 
उषा , जहाँ 
हिमालय का गौरव 
बढ़ाते हैं ,
हर पल आँचल 
में समेटे ,
अठखेलियाँ करती ,
गंगा की लहरें ,
आँख मिचौली 
खेलती है ,
सतरंगी पत्थरों पर 
रास्ता बनाती माँ ,
इधर -उधर 
मचलती है,
पापा नाशनी
चिरप्रवाहानी,कल -कल करती 
सुख -संवृद्धि बरसाती 
समर्पित हो 
सागर में मिट जाती है . 
विद्या शर्मा ...

1 comment:

संजय भास्कर said...

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com