Wednesday, March 24, 2010

मर्द

यदि , मर्द हो ,
तो ,
पौरुष दिखाओ ,
क्यों डरते हो ?
स्त्री से |
जब , होती है 
किचिन में ,
पतीली में 
दाल, उगलती है 
भाप ,
जब , गीली लकड़ियाँ 
बहाती हैं , उसके 
आंसू ,
हाथ में बेलन लिए 
देती  है , वह
रोटी  को आकार,
तब , दिखाओ न ,
पौरुष |
डरते हो न , तुम !!
जब , बच्चे करते हों परेशान
मांगते हों नास्ता ,
दूध और रोटी 
तुम , ढूंढते हो 
मोज़े और टाई |
तब , मर्दानगी दिखाओ न, 
जाते हो , साथ में 
पिक्चर 
मिल जाये माशूका 
तब , चश्मा लगाकर 
आगे ही चलते जाते हो ,
अब , दिखाओ न,
तेवर ,
मर्द !! 
औरत की बेबसी को 
समझो ,
मर्दानगी के उद्गार के लिए 
देश की सीमाए 
बुलातीं हैं ,
वहां , 
दिखा दो , पौरुष |
विद्या शर्मा ...


2 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना । आभार

ढेर सारी शुभकामनायें.

SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

संजय भास्कर said...

ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है