Monday, March 9, 2009

छलिया

दिल दरिया का बहाव है
टकराता है पत्थरों से ,
काटता है बंधन
भरता है नफ़रत की जमीं ,
बुझाता है ,
प्यास चाहत की ।
छलिया है वो ,
चाँद तारे लाने की
बात न करता ,
मांग सितारों से भरूँगा
न , कहता कभी ।
ऐसे , महबूबा को न
बहकाता कोई ,
छल कर सिमटता है ,
बाँहों के आस -पास
फरेबी !!
समंदर न बन ।
विद्या शर्मा ....

2 comments:

Pradeep Kumar said...

दिल दरिया का बहाव है
टकराता है पत्थरों से ,
काटता है बंधन
भरता है नफ़रत की जमीं ,
बुझाता है ,
प्यास चाहत की ।
wah kya tulnaa ki hai
bahut achchhi lagi .
badhaaie.

amarjeet kaunke said...

subhan allah....amarjeet