Thursday, March 25, 2010

अमर बेल

एक बीज 
जाने कहाँ से 
आकार ,
वृक्ष बन गया 
किसी , पंछी ने 
अमर बेल का 
तिनका लाकर 
गिरा दिया ,
बेल , वृक्ष की 
जीवन धारा को 
चूसती रही ,
अपने आलिंगन में 
जकड लिया ,
धीरे -धीरे ,
वृक्ष , अस्तित्वहीन 
हो गया ,
जडहीन होकर 
धारा  शाई हो गया ,
लेकिन ,
अस्तित्व हीन लता 
अमरबेल बन गई |

विद्या शर्मा ...

क्या पाया , क्या दिया ?

हम ही जानते हैं ,
इतनी बड़ी 
जिंदगी में ,
क्या खोया ?
क्या पाया ?
झूंठे इल्जाम , झिड़क 
अवहेलना , विरक्ति 
स्त्री होने की जिल्लत ,
कमाऊ न होने की 
सजा ,
पढ़ी -लिखी होने की 
ईर्ष्या ,
क्या कम था ?
फिर भी ,
प्यार , विश्वास 
संस्कार , उम्मीद 
आशीर्वाद , साहस , उत्साह 
सब कुछ दे दिया |
शायद , एक 
रास्ता खोज 
सकूँ 
उजाले का |

विद्या शर्मा ..

नाम

नाम , अलग 
करता है ,
ओरों से ,
परिवार की 
पहचान है ,
नाम पुरुष है ,
अहंकार है ,
अमरता का बोध है ,
नारी ,
नाम की अधिकारिणी नहीं ,
बेटी !!
यह शब्द ,
पीहर तक 
सार्थक है ,
पति घर में 
,एक नए नाम 
का पीछा करते -करते 
अपना अस्तित्व ही 
भूल जाती है 
सिर्फ एक शब्द 
बच पाता है ,
औरत |
विद्या शर्मा ...

गंगा

ऊँचे -ऊँचे शिखरों पर 
श्वेत , धवल हिम पर 
उतरती सूर्य की 
रश्मियाँ ,
जहाँ इठलाती हैं ,
शशि की कलाएं 
अंगडाइयाँ लेती हैं ,
निशब्द निशा का 
मौन तोडती 
उषा , जहाँ 
हिमालय का गौरव 
बढ़ाते हैं ,
हर पल आँचल 
में समेटे ,
अठखेलियाँ करती ,
गंगा की लहरें ,
आँख मिचौली 
खेलती है ,
सतरंगी पत्थरों पर 
रास्ता बनाती माँ ,
इधर -उधर 
मचलती है,
पापा नाशनी
चिरप्रवाहानी,कल -कल करती 
सुख -संवृद्धि बरसाती 
समर्पित हो 
सागर में मिट जाती है . 
विद्या शर्मा ...

उपेक्षा

उपेक्षा 
पराजय का 
बोध कराती है ,
पराजित व्यक्ति 
दुखी होता है ,
दुःख और दर्द के 
साये में ही ,
कभी कभी बुलंदिया भी 
छू लेता है ,
जिन्हें शायद 
कभी नहीं पा 
सकता था ,
तभी तो ,
ध्रुव एक चमकता 
सितारा बन सका ,
कालिदास भी अमर 
काव्य रच सके ,
तुलसी भी ,
रामचरित की,
 रचना कर सके 
मैं , 
कुछ शब्दों के 
जाल ही बुन रही हूँ ,
न  , कभी कालिदास
 बन सकुंगी 
और न ,कभी 
मीरा .
विद्या शर्मा ...

Wednesday, March 24, 2010

बेटी

बेटी ,
सुन्दर , समझदार 
संस्कारी , ममतामई 
त्याग की मूर्ती 
होती है ,
अतिथि का आदर ,
घर की संभाल 
सब , भाता है उसे ,
पढना , लिखना 
गुडिया सजाना ,
प्यार बांटना 
सब  , जानती है वो, 
बेटी ,
माँ की प्रतिमूर्ति 
किसी के ,
कुटुंब की निर्मात्री,
 होती है |
बेटी ,
के चारो तरफ ,
पूरी दुनियां 
नजर आती है |
विद्या शर्मा ...

उच्छ्वास

ठन्डे गर्म उच्छवासों में 
जाने क्या -क्या ,
रिसता है ?
मेरी किसी 
श्वांस ने अभी तक ,
नहीं बताया ,
उसकी तपन में 
क्या -क्या घुला है ?
मीठी सी चुभन या 
दर्द का सैलाव ,
आशाओं का ज्वार -भाटा या
उद्गारों का रेला ,
आकान्छाओं का बिखराव या 
खुशियों का जश्न ,
उच्छवासों का दरिया 
सब बहा ले जाता है ,
न , बादल गरजे ,न 
बिजली चमकी 
सावन से आंसूं 
बरस गए ,
न , अगन बुझ सकी , न ,
भस्म बन सकी ,
झुलस गए सपने ,
उच्छवासों के 
मेले में , मैं , 
समधिद्थ सी ,
तमाशा देखती रही |
विद्या शर्मा ...