एक बीज
जाने कहाँ से
आकार ,
वृक्ष बन गया
किसी , पंछी ने
अमर बेल का
तिनका लाकर
गिरा दिया ,
बेल , वृक्ष की
जीवन धारा को
चूसती रही ,
अपने आलिंगन में
जकड लिया ,
धीरे -धीरे ,
वृक्ष , अस्तित्वहीन
हो गया ,
जडहीन होकर
धारा शाई हो गया ,
लेकिन ,
अस्तित्व हीन लता
अमरबेल बन गई |
विद्या शर्मा ...
हम ही जानते हैं ,इतनी बड़ी
जिंदगी में ,
क्या खोया ?
क्या पाया ?
झूंठे इल्जाम , झिड़क
अवहेलना , विरक्ति
स्त्री होने की जिल्लत ,
कमाऊ न होने की
सजा ,
पढ़ी -लिखी होने की
ईर्ष्या ,
क्या कम था ?
फिर भी ,
प्यार , विश्वास
संस्कार , उम्मीद
आशीर्वाद , साहस , उत्साह
सब कुछ दे दिया |
शायद , एक
रास्ता खोज
सकूँ
उजाले का |
विद्या शर्मा ..
नाम , अलग
करता है ,
ओरों से ,
परिवार की
पहचान है ,
नाम पुरुष है ,
अहंकार है ,
अमरता का बोध है ,
नारी ,
नाम की अधिकारिणी नहीं ,
बेटी !!
यह शब्द ,
पीहर तक
सार्थक है ,
पति घर में
,एक नए नाम
का पीछा करते -करते
अपना अस्तित्व ही
भूल जाती है
सिर्फ एक शब्द
बच पाता है ,
औरत |
विद्या शर्मा ...
ऊँचे -ऊँचे शिखरों पर
श्वेत , धवल हिम पर
उतरती सूर्य की
रश्मियाँ ,
जहाँ इठलाती हैं ,
शशि की कलाएं
अंगडाइयाँ लेती हैं ,
निशब्द निशा का
मौन तोडती
उषा , जहाँ
हिमालय का गौरव
बढ़ाते हैं ,
हर पल आँचल
में समेटे ,
अठखेलियाँ करती ,
गंगा की लहरें ,
आँख मिचौली
खेलती है ,
सतरंगी पत्थरों पर
रास्ता बनाती माँ ,
इधर -उधर
मचलती है,
पापा नाशनी
चिरप्रवाहानी,कल -कल करती
सुख -संवृद्धि बरसाती
समर्पित हो
सागर में मिट जाती है .
विद्या शर्मा ...
उपेक्षा
पराजय का
बोध कराती है ,
पराजित व्यक्ति
दुखी होता है ,
दुःख और दर्द के
साये में ही ,
कभी कभी बुलंदिया भी
छू लेता है ,
जिन्हें शायद
कभी नहीं पा
सकता था ,
तभी तो ,
ध्रुव एक चमकता
सितारा बन सका ,
कालिदास भी अमर
काव्य रच सके ,
तुलसी भी ,
रामचरित की,
रचना कर सके
मैं ,
कुछ शब्दों के
जाल ही बुन रही हूँ ,
न , कभी कालिदास
बन सकुंगी
और न ,कभी
मीरा .
विद्या शर्मा ...
बेटी ,
सुन्दर , समझदार
संस्कारी , ममतामई
त्याग की मूर्ती
होती है ,
अतिथि का आदर ,
घर की संभाल
सब , भाता है उसे ,
पढना , लिखना
गुडिया सजाना ,
प्यार बांटना
सब , जानती है वो,
बेटी ,
माँ की प्रतिमूर्ति
किसी के ,
कुटुंब की निर्मात्री,
होती है |
बेटी ,
के चारो तरफ ,
पूरी दुनियां
नजर आती है |
विद्या शर्मा ...
ठन्डे गर्म उच्छवासों में
जाने क्या -क्या ,
रिसता है ?
मेरी किसी
श्वांस ने अभी तक ,
नहीं बताया ,
उसकी तपन में
क्या -क्या घुला है ?
मीठी सी चुभन या
दर्द का सैलाव ,
आशाओं का ज्वार -भाटा या
उद्गारों का रेला ,
आकान्छाओं का बिखराव या
खुशियों का जश्न ,
उच्छवासों का दरिया
सब बहा ले जाता है ,
न , बादल गरजे ,न
बिजली चमकी
सावन से आंसूं
बरस गए ,
न , अगन बुझ सकी , न ,
भस्म बन सकी ,
झुलस गए सपने ,
उच्छवासों के
मेले में , मैं ,
समधिद्थ सी ,
तमाशा देखती रही |
विद्या शर्मा ...