स्वनिर्भर बनो
उसमें ,
उत्साह , उमंग ,
आशा ओर विश्वास
समाहित है ,
इन्सान जिज्ञासु ओर
दृढी होता है ,
दिशा हीन
होने पर , ही
गुरु की शरण में
जाता है,
निर्बल होकर तो ,
पतित होता है ,
इसलिए ,
उर्जावान बनो |
विद्या शर्मा ...
प्रतिबिम्ब हर शब्द के साये में मेरा प्रितिबिम्ब ही नज़र आता है , हर पद्य की उलझन में मैं, उलझती ही जाती हूँ , हर लम्हे के साथ मैं , जिन्दगी जीती नज़र आती हूँ , हर लम्हा मेरा प्रतिबिम्ब ही है .
Sunday, March 28, 2010
पुल
पुल !! तुम
सुच -मच
महान हो ,
कभी न मिलने वाले
किनारे भी ,
मिलाकर
असंभव को संभव कर दिया है|
छोटे गाँव को
शहर से जोड़
दिया है |
वीरानों को
भीड़ से मिला दिया है |
रिश्तों को
दिलों से जोड़
दिया है |
नई-नई आशाओं को
साकार किया है |
पुल !!
तुम महान हो |
विद्या शर्मा ...
सुच -मच
महान हो ,
कभी न मिलने वाले
किनारे भी ,
मिलाकर
असंभव को संभव कर दिया है|
छोटे गाँव को
शहर से जोड़
दिया है |
वीरानों को
भीड़ से मिला दिया है |
रिश्तों को
दिलों से जोड़
दिया है |
नई-नई आशाओं को
साकार किया है |
पुल !!
तुम महान हो |
विद्या शर्मा ...
तूफ़ान
हवाओं का सैलाव
आंधी , तूफ़ान , बबंडर
कभी , चक्रवात बन
सब कुछ ,
तबाह करता है |
देश , राष्ट्र , नगर
गाँव ,ओर चौपारे
कभी ,
नष्ट होते हैं ,
तो , कभी ,
आबाद होता है ,
समाज |
भावों , विचारों की
श्रंखला सा ,
सब कुछ,
टूटता , बिखरता है |
बांध से बांधे रिश्ते
दरक कर ढह
जाते हैं |
कभी ,
ठहरी झील से
संबंधों को
समेटती हूँ |
उमंगों के तूफ़ान
घेर लेते हैं
मुझे |
विद्या शर्मा ...
आंधी , तूफ़ान , बबंडर
कभी , चक्रवात बन
सब कुछ ,
तबाह करता है |
देश , राष्ट्र , नगर
गाँव ,ओर चौपारे
कभी ,
नष्ट होते हैं ,
तो , कभी ,
आबाद होता है ,
समाज |
भावों , विचारों की
श्रंखला सा ,
सब कुछ,
टूटता , बिखरता है |
बांध से बांधे रिश्ते
दरक कर ढह
जाते हैं |
कभी ,
ठहरी झील से
संबंधों को
समेटती हूँ |
उमंगों के तूफ़ान
घेर लेते हैं
मुझे |
विद्या शर्मा ...
अक्षर
अक्षर , कभी
ब्रह्म , कभी , आकाश और
कभी , समुद्र सा
होता है |
कभी ,
अनंत , विशाल और
शक्तिशाली तो ,
कभी न्यून , अशक्त और
दुर्बल होता है |
कभी चढ़ाता है हिम्तुंग पर
कभी गिराता है
गहरी खाई में |
कभी ,
घुमाता है
जीवन को चहु ओर,
कभी हंसाये ,
कभी रुलाये ,
अक्षर ,
राजा को भी रंक
बना दे ,
कभी तेली को
सौदागर |
कभी ,
फौलाद सा कठोर
बन जाए ,
कभी शबनम सा
जहर जाये |
विद्या शर्मा ...
Saturday, March 27, 2010
तिरंगा
विश्व विजयी
तिरंगा !!!
हमें ,
उत्साहित , प्रेरित
और
अभिमानित करता है ,
बलिदान और त्याग
का पाठ
पढ़ाकर
केशरिया , हमें
वीरता से
ओतप्रोत करता है ,
सत्य मार्ग से
शांत रहकर
ज्ञानी बनाने की राह
श्वेत रंग
दीखता है ,
दृढ प्रतिग्य और
समृद्ध रहने की
भावना हरा रंग
भरता है ,
नीले रंग के
चौबीस चक्रों का क्रम
हमें ,
गतिशीलता का
पैगाम देता है ,
हमारा यह तिरंगा !!!
आकाश की
ऊँचाइयों को मापने का
साहस देता है \
विद्या शर्मा ..
तिरंगा !!!
हमें ,
उत्साहित , प्रेरित
और
अभिमानित करता है ,
बलिदान और त्याग
का पाठ
पढ़ाकर
केशरिया , हमें
वीरता से
ओतप्रोत करता है ,
सत्य मार्ग से
शांत रहकर
ज्ञानी बनाने की राह
श्वेत रंग
दीखता है ,
दृढ प्रतिग्य और
समृद्ध रहने की
भावना हरा रंग
भरता है ,
नीले रंग के
चौबीस चक्रों का क्रम
हमें ,
गतिशीलता का
पैगाम देता है ,
हमारा यह तिरंगा !!!
आकाश की
ऊँचाइयों को मापने का
साहस देता है \
विद्या शर्मा ..
Thursday, March 25, 2010
संध्या बेला
रात ढल गई पहर -पहर
भोर भई मचल -मचल
धुप छिटक गई मुडेर -मुडेर
घड़ा लिए कमसिन चली मटक -मटक
हल -बैल चल पड़े मचक- मचक
खेत की पुराई हुई अचक -अचक
फसल हुई लहर -लहर
फूल खिले बसंती महक -महक ,
रेत जला उठी पांव गरम -गरम
छाँव को ललक रहे तरस -तरस
प्यास से गला गया चटक -चटक
तन हुआ बेदम झुलस -झुलस
पंछी छुप रहे कुटर- कुटर
बयार खोजते रहे टुकुर -टुकुर
छाँव आ चली सरक -सरक
घर लौट चले हम डगर - डगर
पंछी उड़ चले पतंग-पतंग
अमराई झुक गई लचक -लचक
उठने लगा धुआं महल -महल
दौड़ पड़े बछड़े ठुमक -ठुमक
रात आ गई द्वार -द्वार
अभिसारिका गईं संवर -संवर
बज उठीं पायल झनक- झनक
छिपा चली सारंग मटक -मटक
पंथ निहार रही अटक -पटक
बेसुध सी लौट पड़ी सुबक -सुबक |
विद्या शर्मा ...
भोर भई मचल -मचल
धुप छिटक गई मुडेर -मुडेर
घड़ा लिए कमसिन चली मटक -मटक
हल -बैल चल पड़े मचक- मचक
खेत की पुराई हुई अचक -अचक
फसल हुई लहर -लहर
फूल खिले बसंती महक -महक ,
रेत जला उठी पांव गरम -गरम
छाँव को ललक रहे तरस -तरस
प्यास से गला गया चटक -चटक
तन हुआ बेदम झुलस -झुलस
पंछी छुप रहे कुटर- कुटर
बयार खोजते रहे टुकुर -टुकुर
छाँव आ चली सरक -सरक
घर लौट चले हम डगर - डगर
पंछी उड़ चले पतंग-पतंग
अमराई झुक गई लचक -लचक
उठने लगा धुआं महल -महल
दौड़ पड़े बछड़े ठुमक -ठुमक
रात आ गई द्वार -द्वार
अभिसारिका गईं संवर -संवर
बज उठीं पायल झनक- झनक
छिपा चली सारंग मटक -मटक
पंथ निहार रही अटक -पटक
बेसुध सी लौट पड़ी सुबक -सुबक |
विद्या शर्मा ...
तिनका
मुझे , बहाकर ले गई
एक धारा ,
तब , क्या खबर थी
क्या होगा ?
कहाँ जाऊंगा ?
भंवरों में घिर गया
तो ,
झिंझोड़ा जाऊंगा ,
पत्थरों से ,
टकरा गया तो ,
टूटकर लहरों में
समां जाऊंगा ,
किनारा मिल गया तो ,
ठोकर से खेला
जाऊंगा ,
बार -बार
घूमता ही रहूँगा
तभी समझ पाउँगा
संसार चक्र को |
विद्या शर्मा ..
एक धारा ,
तब , क्या खबर थी
क्या होगा ?
कहाँ जाऊंगा ?
भंवरों में घिर गया
तो ,
झिंझोड़ा जाऊंगा ,
पत्थरों से ,
टकरा गया तो ,
टूटकर लहरों में
समां जाऊंगा ,
किनारा मिल गया तो ,
ठोकर से खेला
जाऊंगा ,
बार -बार
घूमता ही रहूँगा
तभी समझ पाउँगा
संसार चक्र को |
विद्या शर्मा ..
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