Wednesday, March 24, 2010

माँ की अंगुली

डगमग चलते 
शिशु की ,
अंगुली में 
माँ की उर्जा 
प्रवाहित है ,
तभी ,तो ,
साहस , उत्साह , संरक्षण का 
संचार निरंतर 
स्फूर्ति जगाता है ,
माँ की अंगुली से ,
संस्कार स्वयं 
रोपित होते हैं ,
माँ की , अंगुली से 
स्वर्गारोहण सा 
आभास होता है ,
अंगुली के पोरों से 
लगाया , काजल 
दिव्य प्रकाश सा 
फैलता है ,
माँ की अंगुली 
एक , मशाल सी 
जलाकर 
हमारी राहें 
रौशन करती है |
विद्या शर्मा ...

दर्द

दर्द , बनकर रहना 
क्या , आता है ?
सभी को ,
दर्द , पीकर 
क्या , जीना
 आता है ?
सभी को ,
दर्द , सिलकर 
लपेटना ,क्या 
आता है ?
सभी को ,
दर्द को ,
मुस्कराकर सहना 
क्या , आता है ?
सभी को ,
दर्द को ,
सीने में , दबाकर 
अदृश्य कर देना 
क्या ,
आता है ?
सभी को |
विद्या शर्मा ...

पेड़

सामने वाला पेड़ 
खुली किताब सा है ,
पन्ने -दर -पन्ने 
पढ़ते रहो ,
मौसम जब ,
हसीं होता है ,
मोटी -मोटी डालें 
गधांश बन जाती हैं ,
पतली डालें ,
वाक्यांश बनती हैं ,
वे , मिलजुलकर 
शब्दार्थ समझतीं हैं ,
अगणित कोमल कोपलें ,
अर्नव बन ,
वेदार्थ बताती हैं ,
लटकते सूखे पत्ते ,
त्रुटियों से ,
टपक पड़ते हैं ,
इस , वृक्ष का 
कभी कोई , पृष्ठ 
पलटा नहीं गया ,
कभी , उच्चारित नहीं किया ,
गुम- सुम सा नीड़ 
लोकोक्तियाँ कहता है 
जब , 
परिंदे चहचहाते हैं ,
चिड़िया , तोता , गिलहरी 
कबूतर सब ,
भाषा की बिविधिता 
की तरह ,
मुहावरे जैसे 
बरसाते हैं ,
सामने वाले पेड़ ,
के फल -फूल 
अलंकार से 
हमारे दिल को 
गुदगुदाते हैं ,
जाने , कबसे 
यह , वृक्ष !!
हमारे आँगन में ,
साहित्य सा 
बस गया है |
विद्या शर्मा ....

मर्द

यदि , मर्द हो ,
तो ,
पौरुष दिखाओ ,
क्यों डरते हो ?
स्त्री से |
जब , होती है 
किचिन में ,
पतीली में 
दाल, उगलती है 
भाप ,
जब , गीली लकड़ियाँ 
बहाती हैं , उसके 
आंसू ,
हाथ में बेलन लिए 
देती  है , वह
रोटी  को आकार,
तब , दिखाओ न ,
पौरुष |
डरते हो न , तुम !!
जब , बच्चे करते हों परेशान
मांगते हों नास्ता ,
दूध और रोटी 
तुम , ढूंढते हो 
मोज़े और टाई |
तब , मर्दानगी दिखाओ न, 
जाते हो , साथ में 
पिक्चर 
मिल जाये माशूका 
तब , चश्मा लगाकर 
आगे ही चलते जाते हो ,
अब , दिखाओ न,
तेवर ,
मर्द !! 
औरत की बेबसी को 
समझो ,
मर्दानगी के उद्गार के लिए 
देश की सीमाए 
बुलातीं हैं ,
वहां , 
दिखा दो , पौरुष |
विद्या शर्मा ...


Sunday, March 14, 2010

प्रतिमा

प्रतिमा ,
तुम रूप हो 
किसी का ,या 
जादू हो ,
किसी के नाजुक 
हाथों के 
पोरों की 
तुम , कला हो 
या 
कलाकार को तुम 
गढ़ती हो 
या कलाकार तुम्हें 
गढ़ता है |
तुम पसंद हो 
उसकी या 
वो पसंद है , तुम्हारी|
प्रेरणा हो 
तुम उसकी या 
प्रेरित है वो तुमसे ,
प्रियतम है वो 
तुम्हारा या 
प्रेयसी हो तुम 
उसकी |
साधिका हो तुम 
उसकी या 
साधक है वो 
तुम्हारा |
हे !! प्रतिमा !!
याचिका हो तुम 
उसकी या
याचक है वो 
तुम्हारा ?
क्या हो ????

विद्धया शर्मा ..

झरना

बहते हुए 
तुम,
 इस कदर 
वेग से ,
प्रवाहित हो 
रहे हो ,
सब कुछ भूलकर 
दौड़ लगा रहे हो ,
पल भर रूककर 
पीछे भी नहीं 
देखते हो ,
किसी के साथ 
चलने की 
अपेक्षा भी नहीं 
करते हो ,
हर बंधन को 
तोड़कर ,
निरंतर चलते ही जा 
रहे हो ,
किसके लिए ?
शायद ,
रूठी प्रेमिका को 
अपने अंक में 
समेट लेना 
चाहते हो ,
या फिर 
किसी,
 अजनवी की
 खोज में
खाक छान रहे हो |

विद्धया शर्मा .. 

तनहाइयाँ

 जीवन के 
झंझावातों के 
सैलाव में ,
डूबकर भी ,
तैरती रही |
अपनों से 
दूर -बहुत दूर 
होती रही ,
सभी मेरे साथ
तपते रहे ,
जीवन की 
भट्टी में ,
और तनहाइयों को 
मथती रही |
बच्चियां भी 
विदा ले चुकीं हैं ,
बंद रास्तों पर आकर 
ठहर सी गई हूँ ,
बहता सा जीवन भी 
एकाकी लगता है |

विद्धया शर्मा ..