Sunday, March 14, 2010

सुमन

हे सुमन !!
तुम ,
खिलते , महकते 
मुस्कराते हो ,
डाल से 
तोड़ने पर भी ,
व्यथित नहीं होते ,
हमारे मन को
मुदित , पुलकित 
और आनंदित 
करते हो ,
निष्काम , निर्द्वन्द रहकर 
असीमितता 
दिखाते हो ,
मौन रहकर भी 
ज्ञान फैलाते हो ,
मन करता है 
अपना , कलुष 
तुमसे बदल लूं ,
हे सुमन !!

विद्धया शर्मा.. 

माँ

वह शक्ति 
केवल तुम ही हो 
माँ ,
जो , मुझे 
दूसरों की नज़रों से 
बचा कर 
रखती है |
जब , 
छल -कपट 
झूंठा व्यवहार 
अपशब्द 
मुझे पीड़ा देते हैं ,
तब ,
तुम ही 
सांत्वना देती हो |
जब ,
तीखी ,अशिष्ट , निर्लज्ज 
निगाहें मुझे ,
भयाक्रांत करती हैं 
तब ,
तुम ही 
आँचल में 
समेत लेती हो माँ ,
अहंकार से सना 
चेहरा जब ,
मुझे ,
घायल करता है 
तब ,
तुम ही 
मुझे , शीतल छायादार 
वृक्ष की तरह 
आसरा देती हो ,
माँ |

विद्धया शर्मा ..

सागर

में , सागर हूँ ,
मुझमें 
असीम गहराई 
और अनंतता है ,
असंख्य रत्नों से भरा हूँ ,
युगों पूर्व से ,
जब भी ,
तुमने मंथन किया है ,
अनेकों उपहार दिए हैं 
सीप और मोती मेरी 
संतानें हैं ,
तुम चाहो तो 
खोज लो ,
कुछ और भी |
उसके लिए 
मुझे समझना होगा ,
मेरी तली में ,
आना होगा |
जो , शायद 
तुम्हें कठिन लगे |
साहस  करो 
कुछ भी मुश्किल नहीं है |

विद्धया शर्मा ..

चाहो , तो ले लो

स्नेह , प्यार , ममता 
सब ,
फरेब है ,
लोभ और तृष्णा है ,
तुम ,
चाहो तो ,
ले लो 
फूलों की बहार .
रंग , रूप , आकर्षण
सब ,
भ्रम हैं ,
तुम चाहो तो ,
ले लो
जीवन का
उतार -चढाव
उत्थान -पतन ,
दुःख -सुख
सब , सफ़र है तुम चाहो तो ,
ले लो ,
पर ,
मुझे , परम शांति में
लीन रहने दो.|

विद्धया शर्मा ..

Friday, March 5, 2010

तलाश

सोते - जागते  देखे 
मधुर - डरावने 
धुंधले 
स्वप्नों की 
मुझे ,
तलाश है ,
दूर बादलों में 
गुम हुए 
साए से ,
उन , सपनों की 
मुझे तलाश है ,
जो , 
जागते हुए भी 
सोये हुए अधरों पर 
आई ,
मुस्कान को 
चुरा ले गए 
उस , 
अस्पष्ट अहसास की 
मुझे तलाश है ,
शजों को झंकृत कर 
स्वरों की 
तान झेड़ने से 
घायल हुए 
पोरों की 
मीठी सी 
चुभन की मुझे ,
तलाश है ,
उन ,
सपनों को
 जीना चाहती हूँ ,

विद्धया शर्मा ...

आँचल

में ,
जब , छोटी थी 
मां !!
अपने  पांव पर 
चलने लगी थी 
तब , 
तुम्हारा  लहराता आँचल 
मुझे , आकृष्ट 
करता था ,
एक छोर पकड़कर 
खुश होती थी 
अब , जब 
बड़ी हो गई हूँ ,
जब , कभी डर 
जाती हूँ ,
बाबा की फटकार से 
तब , 
तलाशती हूँ ,
वही , आँचल 
तुम्हारा लहराता 
आँचल 
मुझे , छुपा लेता है 
अपने भीतर 
बाबा , हताश हो चले जाते 
अब ,
मेरा आँचल 
तुम्हारे जैसा 
हो गया है 
पर ,
मां !! 
मुझे, वह शकून
नहीं मिलता
आज भी ,
उसी , आँचल को 
तलाशती हूँ 
जो , मुझे 
अपने आगोश में 
छुपा ले ,
सारी परेशानियों 
चिंताओं से 
मुक्त कर दे 
अथाह शांति की 
नींद सुला दे .
विद्धया शर्मा 
 


Tuesday, February 16, 2010

हे प्रभु जी !! आओ , एक बार

हे !! प्रभु जी !!
आप पृथ्वी पर आयें 
और देख लें ,
कि..
जीवन क्या होता है ?
सुख और दुःख का 
आभास करें .
भूख और प्यास की 
तड़फ का अनुभव करें ,
तपती दुपहरी में 
जब पांव जलें 
जमी पर .
सर्दी से जब ,
वदन ठिठुरता 
भीगे तन - मन बारिस में .
दर-दर की ठोकर खाते 
फिर भी न मिलाता चैन .
चना -चबैना कोई देता 
एक लोटा पानी .
तृषा शांत तब हो जाती ,
जब , छाँव मिल जाती प्यारी .
चार -दीवारें और एक छत 
कैसे मिलाती ?
ये तुम कैसे जानोगे ?
जब गज भर धरती 
नसीब होती , मुश्किल से .
आओ , एक बार 
प्रभु जी !! 
देखो दुनियां दारी.
विद्या शर्मा ...